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60 की उम्र के बाद शरीर में होने लगते हैं ये 6 बदलाव, भूलकर भी न करें इन्हें बीमारी समझने की गलती

ढलती उम्र के साथ शरीर में कई तरह के बदलाव आना एक बेहद स्वाभाविक और प्राकृतिक प्रक्रिया है, जिसे कोई चाहकर भी नहीं रोक सकता। अमूमन जब लोग 60 की उम्र को पार करते हैं, तो उनके शरीर में कुछ ऐसे फिजिकल और मेंटल बदलाव नजर आने लगते हैं जिन्हें देखकर वे अक्सर घबरा जाते हैं। जानकारी के अभाव में कई बुजुर्ग इन सामान्य बदलावों को किसी गंभीर बीमारी का संकेत समझने की बड़ी गलती कर बैठते हैं और मानसिक तनाव का शिकार हो जाते हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, 60 साल की उम्र के बाद शरीर का पहले जैसा सक्रिय न रहना या उसमें कुछ बुनियादी परिवर्तन आना पूरी तरह से नॉर्मल है। ऐसे में बुजुर्गों को इन बदलावों से डरने के बजाय इन्हें सही तरीके से समझने और अपनी जीवनशैली में जरूरी सुधार करने की आवश्यकता होती है।

त्वचा का ढीलापन और रिंकल्स आना है पूरी तरह प्राकृतिक, कोलेजन की कमी से घटता है कसाव

बढ़ती उम्र में सबसे पहला और साफ दिखने वाला असर हमारी त्वचा पर पड़ता है. 60 की उम्र के बाद त्वचा को कसाव देने वाला बेहद महत्वपूर्ण प्रोटीन, जिसे कोलेजन कहा जाता है, उसका उत्पादन शरीर में काफी कम होने लगता है। कोलेजन की कमी के कारण त्वचा अपनी स्वाभाविक इलास्टिसिटी (लचीलापन) खो देती है, जिससे चेहरे, हाथों और गर्दन पर झुर्रियां (रिंकल्स) साफ नजर आने लगती हैं। इसके साथ ही त्वचा पहले से अधिक पतली और ड्राई भी हो जाती है। इस प्राकृतिक बदलाव से परेशान होने के बजाय बुजुर्गों को अपनी त्वचा को नियमित रूप से अच्छी तरह मॉइस्चराइज करना चाहिए और शरीर में नमी बनाए रखने के लिए पर्याप्त मात्रा में पानी पीने की आदत डालनी चाहिए।

छोटी-मोटी बातें भूलने से न डरें, दिमाग को एक्टिव रखने के लिए अखबार और पजल्स का लें सहारा

शारीरिक बदलावों के साथ-साथ इस उम्र में याददाश्त में भी हल्का धीमापन देखने को मिलता है। अक्सर बुजुर्ग जब घर की चाबियां कहीं रखकर भूल जाते हैं, या किसी परिचित का नाम याद करने में थोड़ा समय लेते हैं, तो वे अल्जाइमर जैसी दिमागी बीमारियों के डर से घिर जाते हैं. डॉक्टरों का कहना है कि 60 के बाद मस्तिष्क की कार्यप्रणाली की गति थोड़ी धीमी हो जाना एक सामान्य प्रक्रिया है और इसका मतलब यह कतई नहीं है कि दिमाग खराब हो रहा है. इस तरह की सामान्य भूलने की आदत से निपटने और दिमाग को एक्टिव रखने के लिए बुजुर्गों को रोजाना अखबार पढ़ने, क्रॉसवर्ड या पजल्स सॉल्व करने और रचनात्मक गतिविधियों में समय बिताने की सलाह दी जाती है।

हड्डियों और जोड़ों का हल्का दर्द है साइनोवियल फ्लूइड की कमी का संकेत, सुबह की वॉक देगी आराम

इसके अलावा, बढ़ती उम्र में हड्डियों और जोड़ों में हल्का दर्द या अकड़न होना भी एक आम समस्या है. 60 वर्ष के बाद मानव शरीर में कैल्शियम का स्तर गिरने लगता है और जोड़ों के बीच घर्षण को रोकने वाली चिकनाई (साइनोवियल फ्लूइड) कम हो जाती है. यही वजह है कि सुबह सोकर उठने के बाद जोड़ों में स्टिफनेस महसूस होती है या उठते-बैठते समय घुटनों से कटकट की हल्की आवाज आती है. अगर यह दर्द असहनीय नहीं है, तो पैनिक होने की जरूरत नहीं है। इस समस्या से राहत पाने के लिए बुजुर्गों को हर सुबह हल्की वॉक करनी चाहिए और चिकित्सक की सलाह पर कैल्शियम व विटामिन-डी के सप्लीमेंट्स का सेवन शुरू करना चाहिए।

उम्र के साथ धीमा होने लगता है पेट का मेटाबॉलिज्म, गैस और कब्ज से बचने को डाइट में बढ़ाएं फाइबर

पाचन तंत्र का धीमा होना भी इस उम्र का एक प्रमुख लक्षण है. जवानी के दिनों में जो भारी भोजन बहुत आसानी से पच जाता था, 60 की उम्र के बाद उसे पूरी तरह डाइजेस्ट होने में काफी समय लगता है. पेट का मेटाबॉलिज्म स्लो होने के कारण ही अक्सर बड़े-बु बुजुर्गों को गैस, एसिडिटी या कब्ज की शिकायत बनी रहती है. इस समस्या का सबसे सरल समाधान यह है कि बुजुर्ग अपने खान-पान में बदलाव करें. उन्हें अपनी दैनिक डाइट में हरी पत्तेदार सब्जियां, ताजे फल, दलिया और फाइबर से भरपूर चीजें शामिल करनी चाहिए, साथ ही भारी या अत्यधिक तैलीय भोजन से परहेज करते हुए दिनभर में गुनगुने पानी का सेवन करना चाहिए।

बुजुर्गों में नींद का पैटर्न बदलना और नजर-सुनने की क्षमता का घटना है सामान्य एजिंग प्रोसेस

नींद के पैटर्न में बदलाव आना भी बुजुर्गों में बेहद आम है. अक्सर देखा जाता है कि घर के बुजुर्ग रात को बहुत जल्दी सो जाते हैं और सुबह 4 से 5 बजे के बीच ही उनकी नींद खुल जाती है, या फिर रात में कई बार उनकी नींद टूटती है. चिकित्सा विज्ञान के अनुसार, बुजुर्गों को युवाओं की तरह बहुत गहरी नींद नहीं आती है, जो कि एक सामान्य जैविक बदलाव है. अगर कम नींद लेने के बाद भी बुजुर्ग दिनभर तरोताजा और ऊर्जावान महसूस करते हैं, तो उन्हें इसके लिए मानसिक तनाव लेने या बिना डॉक्टरी सलाह के नींद की गोलियां खाने की बिल्कुल भी जरूरत नहीं है।

इन सबके साथ ही, 60 की उम्र के बाद आंखों और कानों की क्षमता में भी आंशिक कमी आने लगती है. उम्र बढ़ने से आंखों के लेंस थोड़े कड़े हो जाते हैं, जिससे पास की चीजें धुंधली दिखने लगती हैं और अखबार पढ़ने या मोबाइल चलाने के लिए चश्मे की आवश्यकता पड़ती है. ठीक इसी प्रकार, कान के अंदर की नसें कमजोर होने से धीमी आवाजें सुनने में परेशानी हो सकती है. यह बेहद सामान्य एजिंग प्रोसेस है, जिसे एक सही पावर के चश्मे या आधुनिक हियरिंग ऐड (कान की मशीन) की मदद से आसानी से प्रबंधित किया जा सकता है. इसलिए, इन 6 बदलावों को बीमारी न मानकर सकारात्मकता के साथ स्वीकार करें और एक स्वस्थ दिनचर्या अपनाएं

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