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तीन पुरुषों के इर्द-गिर्द घूमती है फिल्म ‘दुर्लभ प्रसाद की दूसरी शादी’

क्लाइमैक्स को और ज्यादा दमदार बनाया जा सकता था
लखनऊ। निर्देशक सिद्धांत राज की फिल्म ‘दुर्लभ प्रसाद की दूसरी शादी’ पिछले कुछ दिनों में काफी चर्चित रही है। संजय मिश्रा जैसे गुणी अभिनेता और महिमा चौधरी सरीखी खूबसूरत अभिनेत्री की अनकन्वेंशनल जोड़ी और फिल्म के शीर्षक दोनों ने दर्शकों में उत्साह जगाया। उस पर हरफनमौला संजय मिश्रा की मौजूदगी के कारण लगा था कि फिल्म मजेदार होगी, मगर अफसोस कमजोर कहानी और स्क्रीनप्ले के कारण यह एक होलसम एंटरटेनर बनने से चूक जाती है।
कहानी बनारस में रहने वाले तीन पुरुषों के इर्द-गिर्द घूमती है, दुर्लभ प्रसाद (संजय मिश्रा), उसका बेटा मुरली (व्योम यादव) और मुरली के मामा (श्रीकांत वर्मा)। दुर्लभ प्रसाद की पत्नी का कई साल पहले निधन हो चुका है, जबकि मामा के मांगलिक होने के कारण अब तक उनका विवाह नहीं हो पाया है। कहानी में मोड़ तब आता है, जब मुरली को शहर के एक बड़े व्यापारी की बेटी महक (पलक लालवानी) से प्रेम हो जाता है। महक के पिता और परिवार, मुरली के सामने एक अजीब-सी शर्त रख देते है। वे अपनी बेटी की शादी ऐसे परिवार में नहीं करेंगे, जहां कोई महिला सदस्य न हो। घर में कम से कम एक महिला का होना जरूरी है। अब इस अनूठे शर्त को पूरा करने के लिए मुरली अपने विधुर पिता दुर्लभ प्रसाद के लिए दुल्हन तलाशने निकल पड़ता है। इसी बीच शहर में दुर्लभ की भूतपूर्व प्रेमिका बबिता (महिमा चौधरी) की वापसी होती है। बरसों पहले दुर्लभ के पिता के विरोध के कारण दोनों की शादी नहीं हो पाई थी और बबिता विदेश चली गई थी। उसके लौटते ही ये तीनों मिलकर दुर्लभ की दूसरी शादी का प्लान बनाते हैं, ताकि मुरली की शादी का रास्ता साफ हो सके। लेकिन उनके लिए यह राह उतनी आसान साबित नहीं होती, जितनी उन्होंने सोची थी। निर्देशक सिद्धांत राज की फिल्म का आइडिया काफी आकर्षक है, लेकिन उसे पर्दे पर प्रभावी ढंग से एग्जीक्यूट नहीं किया जा सका। दरअसल, फिल्म का पहला भाग काफी सुस्त है। कहानी अपने मुख्य मुद्दे तक पहुंचने में जरूरत से ज्यादा समय लेती है और इसी दौरान मध्यांतर आ जाता है। इंटरवल के बाद फिल्म में कुछ जान आती है, खासकर महिमा चौधरी की एंट्री के साथ। हालांकि, निर्देशक ने बनारसी माहौल में कुछ दिलचस्प किरदारों को पिरोते हुए कई मनोरंजक जरूर दृश्य रचे हैं। एक बुजुर्ग विधुर के लिए दूसरी दुल्हन की तलाश का ट्रैक और भी ज्यादा मजेदार और प्रभावी बनाया जा सकता था। इसके बावजूद सिद्धांत राज ने अपने किरदारों के माध्यम से छोटे शहरों की सोच, पारिवारिक दबाव, बिछड़े प्रेमियों का दोबारा मिलना और महिलाओं को उनके बाहरी रहन-सहन के आधार पर जज किए जाने जैसे अहम मुद्दों को छूने की कोशिश की है। फिल्म का एक मजबूत संदेश यह है कि अगर कोई महिला अकेली रहती है, तो इसका मतलब यह नहीं कि उसका चरित्र संदिग्ध है। अगर वह अपने हिसाब से अपनी जिंदगी जीती है, तो समाज को उसे निशाना बनाने का हक नहीं मिल जाता। यह विचार फिल्म में प्रभावशाली ढंग से सामने आता है। हालांकि कई जगहों पर कहानी सुविधाजनक ट्विस्ट का सहारा लेती नजर आती है। क्लाइमैक्स को और ज्यादा दमदार बनाया जा सकता था। अनिल सिंह की सिनेमैटोग्राफी एक बार फिर बनारस की खूबसूरती को खूबसूरती से उभारती है। वहीं फिल्म के गीत-संगीत पक्ष पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया गया है। अभिनय के मामले में फिल्म सशक्त है। संजय मिश्रा उन अदाकारों में से हैं, जो परकाया प्रवेश करना बहुत अच्छे से जानते हैं। यहां भी वे अपने सहज -सुलभ अभिनय से दुर्लभ प्रसाद के किरदार को यादगार बनाते हैं। बबिता की भूमिका में महिमा चौधरी ताजगी लाती हैं। इंडिपेंडेंट महिला को उन्होंने बहुत ही खूबसूरती और मजबूती से जिया है। संजय मिश्रा और महिमा चौधरी की केमेस्ट्री फिल्म का प्लस पॉइंट हैं। नवोदित कलाकारों में व्योम यादव प्रभाव छोड़ते हैं और आत्मविश्वास के साथ अपनी भूमिका निभाते हैं। पलक लालवानी भी महक के किरदार के साथ न्याय करती हैं। श्रीकांत वर्मा, प्रवीण सिंह सिसोदिया, नवनी परिहार जैसे कलाकरों ने अपने किरदारों को अच्छे ढंग से निभाया है।

ऐक्टर:संजय मिश्रा,महिमा चौधरी,व्योम यादव,पलक लालवानी,श्रीकांत वर्मा
डायरेक्टर :सिद्धांत राज सिंह
रेटिंग-3/5

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