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व्यक्ति का आध्यात्मिक उन्नयन बहुत आवश्यक : योगी

विशेष संवाददाता लखनऊ। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि केवल भौतिक सम्पदा अर्जित करना व्यक्ति को कभी संतुष्ट नहीं करता। व्यक्ति का आध्यात्मिक उन्नयन बहुत आवश्यक है। आध्यात्मिकता का मतलब समाज का परित्याग करना नहीं होता, बल्कि समाज की परिस्थितियों के साथ जूझने की प्रेरणा प्रदान करती है। समाज के साथ सामंजस्य व समन्वय बनाकर चलना ही वास्तविक अध्यात्म है।

मुख्यमंत्री गुरुवार को अपने सरकारी आवास पर श्रीमद् देवी भागवत महापुराण की भाव पूर्ण व्याख्या सहित संगीतमय प्रस्तुति के विमोचन अवसर पर अपने विचार व्यक्त कर रहे थे। यह सस्वर प्रस्तुति मेधज एस्ट्रो के सीएमडी डॉ. समीर त्रिपाठी द्वारा दी गयी है। मुख्यमंत्री ने इस अवसर पर कहा कि शब्द व नीयत शुद्ध हो, तो शब्द ब्रह्म का पर्याय होता है।

शब्द अपने आपमें एक मंत्र है। भारतीय मनीषा ने शब्द को हमेशा महत्व दिया है और सदैव इस बात को माना है कि हर अक्षर व शब्द में मंत्र बनने की सामर्थ्य है। शब्द को किस प्रकार बोला जा रहा है और किस प्रकार व्यक्त किया जा रहा, यह वक्ता पर निर्भर करता है। इसलिए शब्द को ब्रह्म का रूप मानकर जब हम उसका अनुष्ठान करते हैं और अभिव्यक्त करते हैं, तो वह अपने आपमें मंत्र होता है। मुख्यमंत्री ने कहा कि हमारे धर्म ग्रन्थ चेतना के विस्तृत आयाम को प्रस्तुत करने का सशक्त माध्यम बने हैं।

भारतीय ऋषि परम्परा ने जब वेदों, उपनिषदों, पुराणों के मंत्रों की रचना की होगी, वह स्थिति को योग की भाषा में समाधि की स्थिति तथा ईश्वर की भक्ति में लीन उत्कृष्ट कोटि के साधक के लिए मधुमति की स्थिति कही जाती है। हम अपने जीवन में अपनी चेतना के बहुत ही अल्प रूप का उपयोग कर पाते हैं। भारतीय ज्ञान परम्परा ने चेतना के विस्तृत रूप को समझा है।

भारत की ऋषि परम्परा ने ब्रह्मण्ड के विभिन्न रहस्यों का उद्घाटन किया है। दुनिया आज जिन चीजों को समझ रही है, उसका ज्ञान हमारे ऋषि-मुनियों ने पहले ही दे दिया था। उन्होंने धर्म के माध्यम से इस ज्ञान को संरक्षित किया। इस ज्ञान को आगे बढ़ाने का दायित्व प्रत्येक व्यक्ति का है। हमारे धार्मिक ग्रन्थ सम एवं विषम परिस्थितियों में हम सभी की प्रेरणा के स्रोत रहे हैं। धार्मिक ग्रन्थ सम परिस्थितियों में आध्यात्मिक उन्नयन तथा विषम स्थिति में चुनौतियों का सामना करने का सामर्थ्य प्रदान करते हैं।

किसी भी प्रकार की चुनौती हो, चाहे वह आधि दैविक, आधि भौतिक या आध्यात्मिक चुनौती हो, उन सभी का सामना करने के लिए हमारे धर्म ग्रन्थ हम सभी को नई प्रेरणा प्रदान करते हैं। जब लोग अपनी भाषा में अपने इष्ट को आराधना के दो शब्द कहते हैं, तो यह मान्यता है कि इष्ट से उनका सीधे संवाद होता है। मध्यकाल में महान संत तुलसीदास द्वारा लोकभाषा अवधी में श्रीरामचरितमानस की रचना की गयी। तुलसीदास ने उस समय जो कुछ भी श्रीरामचरितमानस के माध्यम से हम सभी को दिया, यह लोकभाषा का ही प्रभाव है।

तुलसीदास ने धर्म को माध्यम बनाकर जन चेतना का कार्य किया। मुख्यमंत्री ने कहा कि श्रीरामचरितमानस की प्रेरणा से मध्यकाल में गांव-गांव में रामलीला का आयोजन प्रारम्भ हुआ। रामलीला आज भी जन-जन को जागरूक करने और सनातन धर्मावालम्बियों को एकजुट होने की प्रेरणा देती हैं। रामलीला के कार्यक्रम में हर जाति और वर्ण के लोगों की पात्रता रहती है। पूरा समाज एकजुट होकर इस कार्यक्रम से जुड़ता है।

महर्षि भारद्वाज के शिष्य महर्षि वाल्मीकि ने भी लोकभाषा लौकिक संस्कृत में रामायण की रचना की। रामायण प्रथम ग्रन्थ है, जिसे लौकिक संस्कृत में रचा गया है। वर्तमान में हमारी भाषा हिन्दी है। धार्मिक ग्रन्थों के संस्कृत सस्वर गायन को हिन्दी भाषा में अनुवाद कर श्रोताओं तक पहुंचाया जाए। मुख्यमंत्री ने कहा कि देवी शक्ति की प्रतीक हैं।

शक्ति की उपासना सनातन धमार्वालम्बी पौराणिक काल से करते आये हैं। हमारे देश में ही शक्ति की आराधना वर्ष में दो बार जरूर की जाती है। पहली बार चैत्र मास की बासंतिक नवरात्रि और दूसरी बार शारदीय नवरात्रि के अवसर पर। यू-ट्यूब में रुचि रखने वाले श्रोताओं के लिए मेधज एस्ट्रो द्वारा सरल तरीके से बोल-चाल की भाषा में धार्मिक रचनाओं का सस्वर गायन लगातार विकसित किया जा रहा है। मेधज एस्ट्रो द्वारा उत्तर प्रदेश पुलिस बल के शहीद कार्मिकों के परिजनों को आर्थिक सहयोग प्रदान करने का कार्य सराहनीय है।

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