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2029 तक ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ व्यवस्था लागू करने की तैयारी तेज

संवैधानिक संशोधनों के बाद लोकसभा व विधानसभा चुनाव एक साथ कराने का लक्ष्य
पीपी चौधरी बोले-अर्थव्यवस्था को होगा बड़ा लाभ, सात लाख करोड़ का होगा फायदा


लखनऊ, विशेष संवाददाता। संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के अध्यक्ष एवं भाजपा सांसद पीपी चौधरी ने कहा कि ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ व्यवस्था लागू करने की दिशा में तेजी से कार्य किया जा रहा है। लक्ष्य वर्ष 2029 में पूरे देश में लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराना है। इसके लिए आवश्यक संवैधानिक एवं कानूनी संशोधन किए जाएंगे। उन्होंने कहा कि यह किसी राजनीतिक दल का एजेंडा नहीं, बल्कि राष्ट्रहित से जुड़ा व्यापक चुनावी सुधार है, जिससे लोकतांत्रिक व्यवस्था और सुशासन दोनों को मजबूती मिलेगी।

गोमती नगर के ताज होटल में आयोजित प्रेसवार्ता में पीपी चौधरी ने कहा कि बार-बार होने वाले चुनावों से विकास कार्य, प्रशासनिक व्यवस्था और अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है। चुनावों के कारण बार-बार आदर्श आचार संहिता लागू होती है, जिससे विकास परियोजनाएं प्रभावित होती हैं जबकि बेसिक और माध्यमिक शिक्षा व्यवस्था पर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। प्रशासनिक मशीनरी तथा सुरक्षा बलों का बड़ा हिस्सा चुनावी प्रक्रिया में व्यस्त हो जाता है। यदि लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ होंगे तो समय, सरकारी संसाधनों और सार्वजनिक धन की बचत होगी तथा शासन अधिक प्रभावी ढंग से संचालित किया जा सकेगा।

उन्होंने कहा कि ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ केवल चुनावों का एक समान समय निर्धारण है और इससे संविधान के मूल ढांचे पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। उनका दावा है कि इस व्यवस्था के लागू होने से देश की अर्थव्यवस्था को करीब सात लाख करोड़ रुपये का लाभ हो सकता है। उन्होंने कहा कि बार-बार चुनाव होने के दौरान बड़ी संख्या में श्रमिक अपने गृह राज्यों में लौट जाते हैं, जिससे उद्योगों में उत्पादन, निर्माण कार्य, शिक्षा व्यवस्था और विकास परियोजनाएं प्रभावित होती हैं। एक साथ चुनाव होने से इन व्यवधानों में कमी आएगी और आर्थिक गतिविधियों को निरंतर गति मिलेगी। जेपीसी अध्यक्ष ने कहा कि देश में एक साथ चुनाव कोई नई व्यवस्था नहीं है।

स्वतंत्रता के बाद 1952, 1957, 1962 और 1967 में लोकसभा तथा अधिकांश राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ हुए थे। उस समय बैलेट पेपर से मतदान होता था और आधुनिक तकनीकी संसाधन भी उपलब्ध नहीं थे, फिर भी चुनाव सफलतापूर्वक संपन्न हुए। बाद में विभिन्न राज्यों में राष्ट्रपति शासन लागू होने, विधानसभाओं के समय से पहले भंग होने, नए राज्यों के गठन तथा आपातकाल के दौरान लोकसभा का कार्यकाल बढ़ने जैसी परिस्थितियों के कारण चुनावी चक्र अलग-अलग हो गया। उन्होंने कहा कि भारतीय मतदाता अत्यंत जागरूक और राजनीतिक रूप से परिपक्व है। इसलिए यह तर्क उचित नहीं है कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ होने पर मतदाता भ्रमित हो जाएगा।

उन्होंने कहा कि पहले भी करोड़ों मतदाता दोनों चुनावों में एक साथ मतदान कर चुके हैं और आज तकनीक तथा चुनाव प्रबंधन पहले की तुलना में कहीं अधिक सक्षम है। पीपी चौधरी ने उन आशंकाओं को भी खारिज किया कि एक साथ चुनाव कराने से संविधान के मूल ढांचे, संघीय व्यवस्था या लोकतंत्र पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। उन्होंने कहा कि यदि वर्ष 1952 से 1967 तक यह व्यवस्था सफलतापूर्वक लागू रही तो आज इसे असंवैधानिक या संघीय ढांचे के विरुद्ध बताना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है। उन्होंने कहा कि ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ की अवधारणा का समर्थन समय-समय पर कई संवैधानिक संस्थाओं और विशेषज्ञ समितियों ने किया है। वर्ष 1983 में चुनाव आयोग, 1999 में विधि आयोग, 2002 में संविधान समीक्षा आयोग, 2015 में संसद की विधि एवं कार्मिक संबंधी स्थायी समिति तथा 2018 में नीति आयोग ने भी इस दिशा में सिफारिशें की थीं।

उन्होंने बताया कि केंद्र सरकार ने वर्ष 2023 में पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में उच्चस्तरीय समिति गठित की थी। समिति ने राजनीतिक दलों, चुनाव आयोग, संवैधानिक संस्थाओं, विधि विशेषज्ञों और अन्य हितधारकों से व्यापक विचार-विमर्श के बाद 18 हजार से अधिक पेज की रिपोर्ट सरकार को सौंपी। समिति ने लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने के साथ स्थानीय निकाय चुनावों को भी निर्धारित समयसीमा में कराने की सिफारिश की है। पीपी चौधरी ने बताया कि केंद्रीय मंत्रिमंडल की ओर से संबंधित विधेयकों को मंजूरी मिलने के बाद उन्हें संसद में पेश किया गया, जहां चर्चा के उपरांत इन्हें विस्तृत परीक्षण के लिए संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजा गया।

समिति का उद्देश्य किसी राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष में रिपोर्ट देना नहीं, बल्कि सभी हितधारकों के सुझावों के आधार पर व्यवहारिक और सर्वसम्मत अनुशंसाएं तैयार करना है। उन्होंने बताया कि संयुक्त संसदीय समिति अब तक उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात और गोवा सहित लगभग 10 राज्यों का दौरा कर चुकी है। इन दौरों के दौरान मुख्यमंत्री, पूर्व मुख्यमंत्री, विधानसभा अध्यक्ष, राजनीतिक दलों, विधि विशेषज्ञों, शिक्षाविदों, उद्योग संगठनों तथा अन्य हितधारकों से सुझाव प्राप्त किए गए हैं। उत्तर प्रदेश के दौरे में भी महत्वपूर्ण सुझाव मिले हैं, जिनका अध्ययन किया जा रहा है।

ईवीएम और चुनावी तैयारियों से जुड़े प्रश्न पर पीपी चौधरी ने कहा कि आज निर्वाचन आयोग के पास आधुनिक तकनीक और बेहतर संसाधन उपलब्ध हैं। यदि आयोग को लगभग छह महीने की तैयारी का समय मिल जाए तो वह पूरे देश में एक साथ चुनाव कराने में पूरी तरह सक्षम है। उन्होंने कहा कि संयुक्त संसदीय समिति सभी सुझावों और आपत्तियों का गंभीरता से अध्ययन कर रही है तथा लोकतांत्रिक मूल्यों और संवैधानिक व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए अपनी अंतिम रिपोर्ट तैयार करेगी, ताकि भविष्य में ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ व्यवस्था को प्रभावी और व्यवहारिक रूप से लागू किया जा सके।

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