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कृषि विधेयकों का विरोध

कृषि क्षेत्र में सुधारों को आगे बढ़ाने के लिए 5 जून 2020 को केन्द्र ने तीन अध्यादेश जारी किया था। इन अध्यादेशों को कानूनी जामा पहनाने के लिए इनसे संबंधित विधेयकों को संसद में पेश किया गया है। इसका पूरे देश में विरोध हो रहा है। सरकार को विपक्ष के साथ ही किसानों और अपने घटक दलों से भी विरोध का सामना करना पड़ रहा है जिसके कारण इनका भविष्य अधर में लटक गया है।

गौरतलब है कि मोदी सरकार अपने पहले कार्यकाल में भूमि अधिग्रहण अध्यादेश लेकर आयी थी, इसका उद्देश्य औद्योगिक विकास की जरूरतों के लिए आसानी से भूमि उपलब्ध कराना था। भूमि अधिग्रहण कानून को भी अध्यादेश के ही रूप में लाया गया था और लगातार तीन बार अध्यादेश के जरिये आगे बढ़ाया, लेकिन संसद में इतना विरोध हुआ कि अंतत: सरकार को इससे पीछे हटना पड़ा। अब एक बार फिर ठीक वैसी ही स्थिति बन रही है।

इस बार विरोध में विपक्ष के साथ किसान और घटक दल भी खड़े हैं। पंजाब में इस विधेयक का सबसे अधिक विरोध हो रहा है और स्थानीय राजनीति के मद्देनजर केन्द्रीय खाद्य प्रसंस्करण मंत्री हरसिमरत कौर ने इस्तीफा भी दे दिया है। वैसे हरसिमरत कौर का इस्तीफा राजनीतिक कदम ही लग रहा है तीन माह पूर्व जब केन्द्रीय मंत्रिमंडल में कृषि सुधारों से जुड़े इन प्रस्तावों को लाया गया था, तब अगर विरोध में इस्तीफा देतीं तो ज्यादा सही होता।

लेकिन जब पंजाब में इसका विरोध शुरू हो गया तो किसानों के साथ एकजुटता दिखाने के नाम पर उन्होंने इस्तीफे का कदम उठाया है। वैसे कृषि सुधार से जुड़े इन तीनों विधेयकों में किसानों के खिलाफ कुछ नहीं है। जबकि विधेयक कानून बनते हैं और इनको ठीक से लागू किया जाता है तो कृषि क्षेत्र में कई ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिलेंगे। सबसे पहले तो यह कि किसान राज्य कृषि उत्पादन मंडी परिषद के शिकंजे से पूरी तरह मुक्त हो जायेंगे और पूरा देश एक कृषि बाजार के रूप में उभरेगा और इस तरह कृषि क्षेत्र में ‘वन नेशन-वन मार्केट’ आकार लेगा।

इसमें अधिक नुकसान राज्यों की मंडी समितियों, आड़तियों और बिचौलियों को होगा। विरोधी भी दरअसल यही कर रहे हैं। कृषि सुधार से जुड़े इन विधेयकों में पहला-‘कृषि उपज व्यापार एवं वाणिज्य विधेयक’, दूसरा-‘आवश्यक वस्तु संशोधन विधेयक’, और तीसरा ‘मूल्य आश्वासन तथा कृषि सेवाओं पर किसान समझौता विधेयक’ है।

इनका सरांश यह है कि कृषि उपज व्यापार एवं वाणिज्य विधेयक के पास होने से किसानों को राज्यों की मंडी सीमाओं से हटकर पूरे देश में उपज बेचने का अधिकार मिल जायेगा और इस पर कोई टैक्स भी नहीं लगेगा। इससे किसानों को लाभ होगा लेकिन राज्य सरकारों, आड़तियों एवं मंडी परिषदों को नुकसान होगा।

इसी तरह आवश्यक वस्तु संशोधन विधेयक में कई वस्तुओं से स्टॉक लिमिट खत्म करने का प्रावधान है ताकि कृषि उत्पादों के प्रसंस्करण एवं मूल्य संवर्द्धन को प्रोत्साहन मिले। मूल्य आश्वासन तथ कृषि सेवाओं पर किसान समझौता विधेयक का सार यह है कि इससे कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग को बढ़ावा मिलेगा। इससे भी किसानों को ही लाभ होगा। इस तरह यह तीनों कानून किसानों एवं खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के हित में है। लेकिन जिनको नुकसान होगा वे अनेक कुतर्कों और भ्रम फैलाकर इसका विरोध कर रहे हैं।

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