नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने खुद को भगवान बताने वाले आसाराम को बड़ा झटका देते हुए उनकी सजा निलंबित करने की मांग ठुकरा दी है। हालांकि, अदालत ने उनकी याचिका पर सुनवाई करते हुए राजस्थान सरकार से दो सप्ताह के भीतर जवाब तलब किया है।
जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस शील नागू की पीठ ने स्पष्ट किया कि फिलहाल जमानत नहीं दी जा रही है। कोर्ट ने कहा कि राज्य का पक्ष सुनने के बाद ही इस पर विचार किया जाएगा कि क्या जमानत देने की कोई गंभीर आवश्यकता है।
पीठ ने यह भी कहा कि जमानत तभी संभव है जब आरोपी की सेहत बेहद खराब हो और उसकी जान को खतरा हो। साथ ही अदालत ने जेल प्रशासन को निर्देश दिया कि आसाराम को उचित चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं।
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ वकील डी.एस. नायडू ने दलील दी कि आसाराम 80 वर्ष से अधिक उम्र के हैं और कई गंभीर बीमारियों से पीड़ित हैं। गौरतलब है कि राजस्थान हाई कोर्ट ने 27 मई को अपने फैसले में 2013 के नाबालिग से दुष्कर्म मामले में आसाराम की दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा था। हालांकि, अदालत ने उन्हें IPC और पीओसीएसओ एक्ट के तहत गैंगरेप और कुछ अन्य आरोपों से बरी कर दिया था।
हाई कोर्ट ने IPC की धारा 376(2)(F) के तहत नाबालिग से दुष्कर्म के मामले में दोषसिद्धि कायम रखी, जिसके चलते ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई उम्रकैद की सजा बरकरार रही। इसके अलावा IPC की धाराएं 342 (अवैध हिरासत), 370(4) (मानव तस्करी), 506 (आपराधिक धमकी), 509 (महिला की गरिमा को ठेस), 354(A) (यौन उत्पीड़न) तथा पीओसीएसओ एक्ट और जुवेनाइल जस्टिस एक्ट की संबंधित धाराओं में भी दोषसिद्धि को बरकरार रखा गया।
हालांकि, हाई कोर्ट ने सह-आरोपी संचिता गुप्ता उर्फ शिल्पी और शरत चंद्र को बरी कर दिया था। उल्लेखनीय है कि 25 अप्रैल 2018 को ट्रायल कोर्ट ने आसाराम को अपने आश्रम में एक नाबालिग छात्रा के यौन उत्पीड़न का दोषी ठहराते हुए आईपीसी, पीओसीएसओ एक्ट और जुवेनाइल जस्टिस एक्ट की विभिन्न धाराओं के तहत उम्रकैद की सजा सुनाई थी।





