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पद, पैसे और प्रतिष्ठा की चाह में खो रहे नैतिकता

सामाजिक नाटक ‘ ब्लैक होल ‘ का मंचन
लखनऊ। बच्चों की सही परवरिश की जगह भौतिक सुख और पद प्रतिष्ठा की अंधी दौड़ में खोये इस पीढ़ी के माता-पिता ब्लैक होल जैसी गहरी शून्यता की ओर बढ़ रहे हैं, जहां मानवीय नैतिकता का संकट दिन पर दिन गहराता जा रहा है। ऐसा ही संदेश राय उमानाथ बली प्रेक्षागृह कैसरबाग में आज शाम मंचित नाटक ‘ब्लैक होल’ दे गया। बिम्ब सांस्कृतिक समिति के कलाकारों द्वारा संस्कृति मंत्रालय नई दिल्ली की रंगमण्डल योजना और भारतीय स्टेट बैंक के सहयोग से राम किशोर नाग के लिखे इस नाटक का मंचन महर्षि कपूर के सधे निर्देशन में हुआ।
नाटक के संदेश भी देता है कि सही मार्गदर्शन और संस्कारों के अभाव में युवा संतान भी अपनी मंजिल तय करने में अक्षम होकर आज भटकाव भरे रास्तों पर हैं। इस दौर में हम भौतिक सुख सुविधा और यश कमाने के चक्कर में इतना आत्मकेन्द्रित हो गये हैं कि अपने समाज, परिवार और संतान तक से सरोकार नहीं रख पा रहे। कुछ मायनों में इससे भी आगे लोग इन्हें अपने लक्ष्य पूर्ति में बाधक मानने लगे हैं। ऐसे में मानवता, नैतिकता, जीवन मूल्य, यहां तक कि रिश्ते भी अपना अर्थ खोने लगे हैं।
इस समस्या प्रधान सामाजिक नाटक में एक बड़ी निजी कम्पनी में अधिकारी कुरु को अपने पद प्रतिष्ठा और जीवन स्तर और ऊंचा उठाने की इतनी लालसा है कि वह अपनी पत्नी आशी को और न बेटे-बेटी विभु और त्रिषा को समय नहीं दे पाता। प्रतिभावान किन्तु महत्वाकांक्षी कवयित्री आशी को भी सम्मान और पुरस्कारों की गहरी चाह है कि वह एक लम्पट कवि रसिक जी के चक्कर में आ जाती है। रसिक उसे बड़े-बडे सब्जबाग दिखाता है। सुनहरे सपनों में खोयी रहने वाली आशी बच्चों को पालने की अपनी जिम्मेदारी छोड़ अपने बेटे विभु को पढ़ने हास्टल भेज देती है। प्रसिद्धि पाने को आतुर आशी अपना पूरा ध्यान बेटी पर भी नहीं दे पा रही है। मां की तरह फिल्मी ग्लैमर से प्रभावित बेटी त्रिशा अपना करियर फिल्मों में बनाना चाहती है। इस माहौल में बेटी भी अपनी मनमानी पर उतारू है। त्रिषा माँ से झगड़ा करके घर छोड़ देती है। अकेली त्रिषा समाज में हमदर्दी और दोस्ती की खाल ओढे भेड़ियों के फंदे में फंस जाती है। दूसरी ओर विभु भी अपनी प्रेमिका द्वारा तिरस्कृत होने पर अवसाद में उसकी हत्या करने का प्रयास करता है। घर का हितैषी नौकर भोले काका परिवार की ऐसी दुर्दशा देखकर बहुत द्रवित है, पर कुछ कर नहीं पाता। कालचक्र घूमता है भोले काका के बेटे का एक दुर्घटना में पैर टूट जाता है। वह कुरु और आशी से गाँव जाकर बेटे को देखने जाने की इजाजत मांगता है। अपनी महत्वाकांक्षाओं और परेशानियों में उलझे कुरु और आशी भोले काका को स्वार्थी बता अपमानित करके घर से निकल जाने को कहते हैं। इसपर भोले काका का बेबाक उत्तर कुरु और आशी को अपने कृत्यों पर निरुत्तर और सोचने को विवश कर देता है। भोले काका कहते हैं कि पद, पैसा नाम पाने और ऊपर उठने के चक्कर में अपनी आँखों के तारों से बहुत दूर ब्लैक होल तक चले गये, जहां हमारा अस्तित्व ही गुम हो जायेगा।
मंच पर अधिकारी कुरु के तौर पर अनुभवी अभिनेता गुरुदत्त पाण्डेय, गृहणी आशी की भूमिका में रितु श्रीवास्तव, पुत्री त्रिषा- मुस्कान सोनी, पुत्र विभु- आकाश सैनी, नौकर भोले काका- महर्षि कपूर और स्नेही रसिक जी के रूप में विवेक रंजन सिंह मंच पर उतरे।

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