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मनोबल का महत्व

राजयोग की सभी साधनाओं के संबंध में यही बात है। यम-नियम जीवन के चिन्तन-चरित्र एवं आचरण में उतारने पड़ते हैं। आसन व्यायाम नहीं, वरन् आसन जमा कर बैठना है। रसोई भी आसन पर बैठकर की जाती है। बोलचाल की भाषा मे ंकिसी कार्य के लिए दृढ्तापूर्वक आरूढ़ होना भी आसन लगाना या आसन जमाना है।

प्राणायाम प्राणवान बनने के लिए किया जाता है। प्राणवान अर्थात मनस्वी मनोबल सम्पन्न। इसी प्रकार प्रत्याहर को संघर्षशीलता कहते हैं। गीता में अर्जुन को जिस युद्ध के लिए प्रोरित किया गया है, वह वस्तुत: आत्मिक क्षेत्र का युद्ध है। मारकाट वाली लड़ाई के लिए गीता जैसे आत्मिक प्रवचन की आवश्यकता नहीं थी। वह प्रत्याहार ही है, जिसे गीतोक्त महाभारत नाम दिया गया है। यह धर्मक्षेत्र-कर्मक्षेत्र में लड़ा जाता है। संचित कुसंस्कारों एवं हेय प्रचलनों के आकर्षणों के दबावों को अस्वीकार करना ही प्रत्याहार है।

अब तीन प्रयोग और शेष रहते हैं धारणा, ध्यान और समाधि। धारणा का तात्पर्य है- मान्यता, स्थापना, स्वीकृति निष्ठा। आदर्शों के विषय में यही तथ्य लागू होता है। आदर्शों को तर्क और तथ्य के आधर पर तो सहज ही स्वीकारा जा सकता है, पर जिस आदर्श को श्रद्धा, प्रज्ञा, निष्ठा के आधार पर हृदयांगम किया गया हो, फलित केवल वही होता है। आस्तिकता, आध्यात्मिता, धार्मिकता के त्रिविध आदर्श प्रमुख हैं।

ईश्वर पर विश्वास आत्मक्षमता पर विश्वास, कर्तव्य कर्मों के दायित्व पर विश्वास इन तीनों के विश्वास को धारणा कहते हैं। यों साधारतया किन्हीं देवी-देवताओं, मंत्रों, गुरुजनों शास्त्रों, पंथों आदि पर विश्वास करना भी धारणा के अर्थ में प्रयुक्त होता है। एक शब्द में धारणा को विश्वास भी कह सकते हैं। ध्यान का तात्पर्य है-अभीष्ट निर्धारण का बार-बार चिन्तन करना। इससे मान्यता परिपक्व होती है। भूल हुई बातों का स्मरण भी ध्यान के आधार पर हो आता है।

अपने आादर्श का, लक्ष्य का, निश्चय का बार-बार स्मरण करने से वह आस्था के रूप में परिणत हो जाता है। यों किसी चित्र का, मस्तिष्क का, व्यक्ति का, कल्पना-सपनों का इच्छानुसार ध्यान किया जाता है। नाद योग में शब्दों का, मेरुदण्ड में षटचक्रों का, मस्तिष्क में ब्रह्मकमल का, मूलाधार में कुण्डलिनी का ध्यान किया जा सकता है।

मस्तिष्क में ब्रह्मग्रन्थि, हृदय में विष्णुग्रंथि, नाभि में रुद्रग्रंथि के ध्यान का विधान है। श्वास-प्रश्वास के समय सोहम ध्वनि की, ध्यान धारणा की जाती है। इसी प्रकार और भी योग सम्प्रदायों में कई-कई प्रकार के ध्यानों का निर्धारण है। विचार चेतना को केन्द्रीभूत करने की साधना है।

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