नई दिल्ली। पुलेला गोपीचंद को आज भी याद है कि जब उनके खेलने के दिनों में बैडमिंटन की स्कोरिंग प्रणाली में बदलाव हुआ था तो कितनी उथल-पुथल मची थी और अब जबकि यह खेल एक और रणनीतिक बदलाव के लिए तैयार हो रहा है तो भारतीय कोच का मानना है कि कुछ खिलाड़ी बाहर हो जायेंगे ।दक्षिण-एशियाई और प्रवासी अभी 21 अंकों के तीन गेम के प्रारूप में बैडमिंटन खेला जाता है लेकिन अगले साल इसे बदलकर 15 अंकों के तीन गेम का प्रारूप कर दिया जायेगा।
बीडब्ल्यूएफ ने कहा कि छोटे प्रारूप से व्यस्त कैलेंडर में खिलाड़ियों के कार्यभार के प्रबंधन में मदद मिलेगी।गोपीचंद ने याद किया कि कैसे उन्होंने बैडमिंटन में कुछ समय के लिए सात अंक के पांच गेम की स्कोरिंग लागू होने से पहले पारंपरिक 15 अंक के प्रारूप के तहत 2001 में ऑल इंग्लैंड का खिताब जीता था।एक साल बाद यह प्रयोग रद्द कर दिया गया और पारंपरिक 15 अंक (पुरूष) और 11 अंक (महिला) के प्रारूप की वापसी हुई।
गोपीचंद ने विश्व चैम्पियनशिप से पहले यहां बातचीत में कहा कि जब मैने आल इंग्लैंड जीता था, तब कुछ महीने बाद वे 15 से सात अंक के प्रारूप पर चले गए थे। मुझे उस समय दिक्कत हुई क्योंकि मैं स्ट्रोक खिलाड़ी था । मुझे सामंजस्य बिठाने में समय लगता था। मुझे वापसी में एक साल लगा।
उन्होंने कहा,जब तक मैने तालमेल बिठाया, वे फिर पारंपरिक प्रारूप में चले गए और मुझे फिर झटका लगा । फिर मेरे लिये वापसी करना बहुत मुश्किल हो गया। इससे फर्क पड़ता है। इससे कुछ खिलाड़ियों को फायदा होगा और कुछ बाहर हो जायेंगे ।गोपीचंद ने कहा कि युगल खिलाड़ियों को सबसे ज्यादा फर्क पड़ेगा क्योंकि छोटे प्रारूप में प्रतिस्पर्धा का हर चरण अहम हो जायेगा।
एक अन्य सवाल पर गोपीचंद ने स्वीकार किया कि सात्विक साइराज रंकीरेड्डी और चिराग शेट्टी के बाद भारत के पास विकल्प नहीं है। उन्होंने कहा ,यह काफी जायज सवाल है । सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों को साथ खेलना चाहिये, ऐसी कोई व्यवस्था होनी चाहिये । पांच साल पहले हमारे पास पांच अकादमी थी लेकिन आज 500 हैं । 500 व्यक्तिगत खिलाड़ी और अलग अलग दिमाग। युगल में समस्या बढ जाती है।





