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राकू फायरिंग : माटी, आग और अनिश्चित सौंदर्य का समकालीन संवाद

लखनऊ में राकू फायरिंग वर्कशॉप का समापन, माटी कला के नए आयामों पर रहा फोकस

 लखनऊ। कला और कलाकारों के बीच संवाद को सशक्त बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के तहत लखनऊ के जानकीपुरम स्थित क्ले एन फायर स्टूडियो में 27 दिसंबर से 4 जनवरी तक आयोजित 9 दिवसीय राकू फायरिंग वर्कशॉप का रविवार को समापन हुआ। इस अवसर पर प्रतिभागी कलाकारों की राकू तकनीक से निर्मित कलाकृतियों की प्रदर्शनी भी लगाई गई। समापन अवसर पर अतिथि के रूप में उपस्थित भूपेंद्र कुमार अस्थाना ने प्रदर्शित कलाकृतियों का अवलोकन करते हुए कहा कि कार्यशालाओं का उद्देश्य केवल कलाकृतियों का निर्माण नहीं, बल्कि उस माध्यम की गहन जानकारी, आपसी संवाद और उसका दस्तावेजीकरण भी है, जो भविष्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। उन्होंने कहा कि लखनऊ में कलाकारों द्वारा स्थापित किए जा रहे स्टूडियो न केवल शहर बल्कि पूरे प्रदेश के लिए एक सकारात्मक एवं शुभ संकेत हैं।
यह कार्यशाला क्ले एन फायर स्टूडियो और आर्क स्टूडियो के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित की गई। क्ले एन फायर स्टूडियो के संस्थापक वरिष्ठ सिरामिक कलाकार प्रेम शंकर प्रसाद एवं आर्क स्टूडियो के संस्थापक सिरामिक कलाकार विशाल गुप्ता हैं। उल्लेखनीय है कि दोनों कलाकार लखनऊ कला महाविद्यालय के पूर्व छात्र रहे हैं और वर्तमान में लखनऊ की कला परंपरा को आगे बढ़ाने में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।
      दोनों स्टूडियों के संस्थापक कलाकार प्रेम शंकर प्रसाद और विशाल गुप्ता ने बताया कि लखनऊ में आयोजित इस राकू वर्कशॉप में तकनीकी प्रशिक्षण के साथ-साथ इस विधा की दार्शनिक पृष्ठभूमि को भी समझने पर विशेष बल दिया गया। प्रतिभागियों को भट्टी संचालन, ग्लेजिÞंग की विभिन्न विधियाँ तथा फायरिंग के बाद की रिडक्शन प्रक्रिया का प्रत्यक्ष अनुभव कराया गया। कार्यशाला में दो प्रकार के ग्लेज—ग्लॉसी और मैट—का प्रयोग किया गया। ग्लॉसी ग्लेज में तांबा, सोना और कांस्य जैसे तत्वों से उत्पन्न चमकदार तथा धात्विक प्रभाव दिखाई दिए, जबकि मैट ग्लेज में शांत, सौम्य और धरातलीय सतह उभरकर सामने आई। इन दोनों प्रकार के प्रभावों ने प्रतिभागियों को यह समझने का अवसर दिया कि तकनीक के सूक्ष्म परिवर्तन किस प्रकार अभिव्यक्ति के स्तर पर गहरे प्रभाव उत्पन्न करते हैं। चार राज्यों से आए कलाकारों और छात्रों ने इस कार्यशाला में भाग लिया और राकू विधा की तकनीकी बारीकियों को प्रत्यक्ष अनुभव के माध्यम से समझा।
 राकू विधा का इतिहास 16वीं शताब्दी के जापान से जुड़ा है, जहाँ इसका विकास चाय समारोह की सौंदर्य परंपरा के अंतर्गत हुआ। सादगी, अनिश्चितता और क्षणिक सौंदर्य राकू कला के मूल तत्व माने जाते हैं। समय के साथ यह तकनीक पश्चिमी देशों तक पहुँची और इसमें रिडक्शन फायरिंग जैसे प्रयोग जुड़े, जिससे राकू कलाकृतियों में अप्रत्याशित रंग, दरारें और धात्विक प्रभाव उभरकर सामने आते हैं। यही कारण है कि प्रत्येक राकू कृति अद्वितीय होती है। कार्यशाला में भाग लेने वाले चार राज्यों से 10 कलाकारों में भातखंडे संस्कृति विश्वविद्यालय से रवि कश्यप (लखीमपुर), पायल सिंह (मऊ), आंध्र प्रदेश से कनूमोनू वेनू, गुरुग्राम से मालिया सहगल, उत्तराखंड के उधम सिंह नगर से नेहा सिंह, बनारस से स्वप्निल मौर्या एवं प्रीति वर्मा, कुशीनगर से सुशील यादव, बिहार से सुचिता सिंह तथा कानपुर से कोमल देवी शामिल रहीं। इस अवसर पर अतिथि द्वारा सभी प्रतिभागी कलाकारों को क्ले एन फायर स्टूडियो एवं आर्क स्टूडियो की ओर से कार्यशाला का प्रमाण पत्र भी प्रदान किया गया। आयोजकों ने बताया कि कार्यशाला में दो प्रकार के ग्लेज—ग्लॉसी और मैट—का प्रयोग किया गया, जिनसे कलाकृतियों में विविध दृश्य प्रभाव देखने को मिले। समापन कार्यक्रम में कलाकारों के साथ-साथ कमला राम, मनीषा श्रीवास्तव, प्रतीक नारायण, पावक नारायण सहित अनेक कला प्रेमी उपस्थित रहे। आयोजकों ने भविष्य में भी इस तरह की कार्यशालाओं और कला संवादों को निरंतर जारी रखने की बात कही।

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