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सीएए ने जगाई बांग्लादेश के विस्थापितों में आस

लखनऊ। पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से धार्मिक रूप से प्रताड़ित होकर पलायन करके भारत में आने वाले लोगों के मन में आज भी उनके ऊपर हुए जुल्म, अत्याचार और अमानवीय कृत्य के घाव ताजा हैं। लेकिन इसके बीच उनके लिए नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) ने एक नयी आस जगाई है। उन्हें उम्मीद है कि अब उनको पूरा न्याय मिलेगा।
मंगलवार को भाजपा की सीएए के समर्थन में अमित शाह की रैली में लखीमपुर खीरी जिले के मोहम्मदी से आये कई लोग एक नई आस के साथ शामिल हुए। ये सारे लोग पूर्वी पाकिस्तान (अब का बांग्लादेश) में अपना घर और जमीन छोड़ कर पलायन करने को मजबूर हो गए. लेकिन वहां हुई बर्बरता की यादें उनको कुरेदती रहती हैं।

खीरी जिले के रमिया बेहड़ ब्लॉक में सुजानपुर (कृष्णनगर) के रहने वाले निरंजन हलधर बताते हैं कि पलायन करने वाले ज्यादातर विस्थापित बांग्लादेश के खुलना, जैसोर और फरीदपुर के रहने वाले थे। हलधर खुद यहां 10 साल की उम्र में अपने पिता के साथ पलायन कर भारत आये थे। उनका कहना है, ‘हम किस्मत वाले थे। क्योंकि बाकि परिवार को लोग हमारे साथ नहीं आ पाए और वहीँ रह गए।’ वह बताते हैं कि उनके पिता के पास बहुत सारी जमीन थी, जहां खेती होती थी, लेकिन सब पीछे छूट गया।

हलधर, जो बंगाली हिन्दू संगठन के अध्यक्ष भी हैं, ने बताया कि शुरूआत में 200 के आसपास परिवार माइग्रेट होकर सन 1952 में आये थे। तब सरकार 5 यकडी जमीन, एक कमरे का मकान और एक जोड़ी बैल दिएगए थे। बाद में 1964 में सरकार ने जमीन को पहले 5 से घटाकर साढ़े 3 एकड़ और बाद में ढाई एकड़ कर दिया। 1964 के बाद विस्थापित होकर आये लोगों को सरकार ने पंजीकृत नहीं किया। वो लोग जहां तहां सड़क के किनारे जहां रोजी रोटी मिली वहां रहे, अब सीएए लागू होने के बाद उम्मीद है कि उनके साथ न्याय होगा और उन्हें पूर्ण नागरिकता मिलेगी।

खीरी जिले के रमिया बेहड़ ब्लॉक में सुजानपुर (कृष्णनगर) के रहने वाले अनुकूल चन्द्र दास ने बताया कि जब उनके पिताजी, मां, दादी और उनका एक छोटा भाई पूर्वी पाकिस्तान के जिला फरीदपुर की तहसील गोपालगंज क्षेत्र से विस्थापित होकर आए तब उनकी उम्र मात्र 14 साल थी। तब उनका परिवार शुरूआत माना कैम्प रायपुर तब के मध्यप्रदेश और वर्तमान छत्तीसगढ़ में रुका। 3 माह तक ट्रांजिट कैम्प में रुकने के बाद पहले 1700 परिवार उधम सिंह नगर और रुद्रपुर आये। वहां से सरकार ने इन परिवारों को खीरी जिले में विस्थापित किया। बाद में भी हजारों परिवार लगातार 1970 तक खीरी में आकर बसे।

दास ने बताया की सरकार ने जमीन तो दी, लेकिन मालिकाना हक नहीं मिला। ‘आज अगर हम चाहे तो भी हमे बैंक से ऋण नहीं मिल सकता। किसी भी तरह का नहीं यहां तक ट्रेक्टर खरीदने के लिए भी नहीं। अब उम्मीद है कि नए कानून के तहत हमे नागरिकता मिलेगी और हम भी अपनी जमीन के मालिक बन सकेंगे। यह स्थिति तब है जब उनके पास वोटर और आधार कार्ड दोनों हैं। इसकी वजह यह है कि उनका बतौर विस्थापित जो पंजीकरण हुआ था, उसकी मियाद भी खत्म हो चुकी है, और 1971 के बाद शरणार्थियों का पंजीकरण भी नहीं हुआ।

बांग्लादेश में अपने बचपन की यादें सुनाते हुए सघन दास बताते हैं कि मुस्लिम समाज के लोग हिन्दू कालोनियों में आकर अल्लाहो अकबर के नारे लगाते हुए भयानक आगजनी, लूटपाट, महिलाओं के साथ बलात्कार, बच्चों बड़ों की हत्या आदि तक कर रहे थे। इससे तंग होकर और अपनी जान बचाकर लाखों लोग वहां से भारत मे भागकर आये। उसके अलावा हमारे पास कोई चारा नहीं बचा था। उनका कहना है कि पलायन करने के बाद भी उनके साथ धोखा हुआ। 1967 में भारत और बांग्लादेश सरकार के बीच समझौता हुआ था कि जो लोग वापस जाना चाहते हों, वे वापस जा सकते हैं। उन्होंने बताया, ‘हम लोग वापस गए भी, लेकिन 1971 में वहां भीषण दंगें हुए और हमे फिर भाग कर भारत आना पड़ा।’

रवीन्द्रनगर, मोहम्मदी तहसील खीरी के रहने वाले निर्मल विश्वास ने बताया कि उनका परिवार बांग्लादेश के जसोर जिला से आये थे। तब निर्मल आठ साल के थे 1964 में अपने माता पिता के साथ आये निर्मल के पिता खीरी तक नहीं पहुंचे और विस्थापन की दौड़ में कलकत्ता में ही उनकी मृत्यु हो गयी। आज निर्मल 65 साल के बुजुर्ग हैं। रवींद्रनगर के ही रहने वाले विधान विश्वास विस्थापन के समय मात्र एक साल के थे। दिसेष मंडल को उम्मीद है कि भारत सरकार ने नागरिकता संशोधन कानून लागू किया है उससे पूर्वी पाकिस्तान और बाद में बंग्लादेष के शरणार्थियों को न्याय मिलेगा।

हिन्दू कालोनियों में लगने वाले ‘अल्लाह ओ अकबर’ के नारों के बीच खुद को असहाय समझने वाले लोग सीएए कानून लागू होंने से आज खुश नजर आ रहे हैं। लखीमपुर के रहने वाले विश्राम विश्वास ने बताया कि वह अपने दादा के साथ 1975 में पूर्वी पाकिस्तान से आए थे। उन्होंने कहा कि हमारे दादा के और उनके परिवार के साथ वहां पर बहुत अन्याय हुआ। हम लोग अपना त्यौहार नहीं माना पाते थे। काफी लूट-पाट होती थी। इसके बाद हमने छोड़ने का निर्णय लिया।
बाद हमने छोड़ने का निर्णय लिया।

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