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जन्म पंजीकरण में निचले पायदान पर यूपी

आशीष मौर्य, लखनऊ। प्रधानमंत्री ने पूरे भारत में जन्म-मृत्यु का पंजीकरण 2024 तक सौ प्रतिशत करने का लक्ष्य दिया। अधिकारियों की उदासीनता के चलते जन्म-मृत्यु पंजीकरण का महत्वपूर्ण कार्य कागजी खानापूर्ति की औपचारिकाताओं तक सिमट कर रह गया है। सबसे खराब स्थिति उत्तर प्रदेश की है। देश के सापेक्ष यूपी में जन्म-मृत्यु के रजिस्ट्रेशन का प्रतिशत काफी कम है। दूसरे राज्यों की तुलना में प्रदेश निचले पायदान पर है। 61 फीसदी ही पंजीकरण हो रहे हैं।

यह हाल तब है जबकि जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण को 1969 की अधिनियम के तहत अनिवार्य किया गया है। वर्ष 2030 तक सभी के जन्म पंजीकरण सुनिश्चित किए जाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इसके लए गृह विभाग को नोडल विभाग नामित किया गया है। अपर मुख्य सचिव अवनीश कुमार अवस्थी ने समस्त जिलाधिकारियों, नगर आयुक्त व अधिशासी अधिकारियों को जन्म पंजीकरण को अ•िायान के रूप में चलाये जाने का निर्देश दिया है।

देश में उपलब्ध अब तक के आंकड़ों के अनुसार उप्र. राज्य जन्म प्रमाण जारी करने एवं जन्म पंजीकरण दर के मामले में निचले पायदान पर मौजूद है। लखनऊ समेत पीएम का संसदीय क्षेत्र वाराणसी भी इस मामले में पिछड़ा है। छत्तीसगढ़, कर्नाटक, अरूणांचल प्रदेश, मिजोरम, मेघालय व मणिपुर तथा राजस्थान आदि राज्यों में सौ फीसदी पंजीकरण हो रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग जन्म पंजीकरण को अभियान के रूप में चला रहा है और वर्ष 2019 तक जन्म लेने वाले प्रत्येक नवजात को जन्म प्रमाण पत्र जारी करने को कहा गया है।

बता दें कि इस वर्ष जन्म लेने वाले प्रत्येक बच्चे का पंजीकरण सीआरवीएस पोर्टल पर करने तथा एक जनवरी 2019 से प्रत्येक बच्चे को जन्म प्रमाण पत्र जारी करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। अधिनियम के अनुसार जन्म के 21 दिनों के भीतर जन्म का पंजीकरण हो जाना चाहिए। सीआरएस पोर्टल पर जन्म पंजीकरण को रजिस्ट्रार जनरल आॅफ इंडिया एवं नीति आयोग संज्ञान लेगा। इसके लिए राज्य सरकार के गृह विभाग को एसडीजी गोल संख्या 16 का नोडल नामित किया गया है। यूपी के आंकडे बेहद चिंताजनक है। सरकारी स्त्रोतों से मिली जन्म व मृत्यु की सूचनाएं तक यहां नहीं भोजी जाती। वहीं दूसरी तरफ जन्म या मृत्यु का प्रमाण पत्र पाने की चाह में लोग संबंधित दफ्तरों के चक्कर काटते हैं।

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