ज्ञानरंजन का निधन बीते 7 जनवरी को जबलपुर में हुआ था
लखनऊ। प्रसिद्ध कथाकार ज्ञानरंजन की स्मृति में स्थानीय बलराज साहनी सभागार, कैसरबाग में लखनऊ के साहित्यकारों व उनके संगठनों की ओर से एक श्रद्धांजलि सभा हुई। इस अवसर पर साहित्यकारों और संस्कृतिकर्मियों ने स्वर्गीय ज्ञानरंजन के योगदान को नमन किया। ज्ञानरंजन का निधन बीते 7 जनवरी को जबलपुर में हुआ था। जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कौशल किशोर ने ज्ञानरंजन का स्मरण करते हुए कहा कि वे एक सक्रियतावादी लेखक थे और उनकी भूमिका सदैव एक एक्टिविस्ट की रही। उन्होंने अपनी कहानियों में आजादी के बाद के सामाजिक यथार्थ को आधार बनाया तथा पारंपरिक कथा लेखन से अलग कहानी को एक नई भाषा दी। नलिन रंजन ने कहा कि ज्ञानरंजन हिंदी साहित्य के विशिष्ट कथाकार और सफल संपादक के रूप में हमेशा याद किए जाएंगे। अपने दौर के कहानीकारों में वे सबसे अलग और विशिष्ट थे। ‘घंटा’, ‘बहिर्गमन’ और ‘पिता’ जैसी कहानियों ने उन्हें अमर बना दिया। उन्होंने अपनी कहानियों के माध्यम से उस दौर के गद्य को भी विशिष्टता प्रदान की। मध्यवर्ग की नई पीढ़ी को उन्होंने अपनी रचनाओं में सशक्त ढंग से अभिव्यक्त किया है। वे सामाजिक व्यवस्था के विभेदीकरण को पहचानने वाले कथाकार थे और उस विभेदीकरण के खिलाफ लड़ने वाली ताकतों का मजबूत होना जरूरी मानते थे। प्रगतिशील लेखक संघ, लखनऊ की अध्यक्ष रीता चौधरी ने कहा कि ज्ञानरंजन का संघर्ष रचनात्मक होने के साथ-साथ वैचारिक भी था। इस मौके पर इप्टा उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष राजेश श्रीवास्तव व महामंत्री शहजाद रिजवी, डॉ. राही मासूम रजा एकेडमी से भगवान स्वरूप कटियार तथा भाकपा से कामरेड परमानंद आदि ने भी अपनी शोक संवेदना व्यक्त की।





