लखनऊ। हर साल वैशाख माह के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि के अगले दिन वरूथिनी एकादशी मनाई जाती है। यह पर्व जगत के पालनहार भगवान विष्णु को समर्पित होता है। इस शुभ अवसर पर भक्तजन प्रात: काल में स्नान-ध्यान कर भक्ति भाव से लक्ष्मी नारायण जी की पूजा करते हैं। वहीं, मनचाही मुराद पाने के लिए व्रत रखा जाता है। धार्मिक मत है कि वरूथिनी एकादशी व्रत करने से साधक के सुख और सौभाग्य में वृद्धि होती है। साथ ही जीवन में व्याप्त सभी प्रकार के संकटों से मुक्ति मिलती है। वहीं, मृत्यु के बाद साधक को उच्च लोक में स्थान मिलता है। वैदिक पंचांग के अनुसार, वैशाख माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि की शुरूआत 13 अप्रैल को देर रात 01 बजकर 16 मिनट पर होगी। वहीं, एकादशी तिथि का समापन 14 अप्रैल को देर रात 01 बजकर 08 मिनट पर होगा। इस प्रकार 13 अप्रैल को वरूथिनी एकादशी मनाई जाएगी।
वरूथिनी एकादशी पारण समय
वरूथिनी एकादशी का पारण 14 अप्रैल को किया जाएगा। पारण का समय 14 अप्रैल को सुबह 06 बजकर 54 मिनट से लेकर सुबह 08 बजकर 31 मिनट तक है। इस दौरान साधक स्नान-ध्यान कर विधिवत लक्ष्मी नारायण की पूजा करें। इसके बाद अन्न का दान कर व्रत खोलें।
वरूथिनी एकादशी शुभ योग
ज्योतिषियों की मानें तो वरूथिनी एकादशी पर शुभ और शुक्ल योग का संयोग बन रहा है। इसके साथ ही शिववास योग भी है। इस दौरान देवों के देव महादेव कैलाश पर विराजमान रहेंगे। वहीं, एकादशी के दिन शतभिषा और धनिष्ठा नक्षत्र का संयोग है। इन योग में भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा करने से साधक के सुख और सौभाग्य में अपार वृद्धि होगी।
कामदा एकादशी का महत्व
कामदा एकादशी का व्रत धार्मिक दृष्टि से अत्यंत प्रभावशाली माना गया है। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु की पूजा और व्रत करने से व्यक्ति के सभी प्रकार के पाप नष्ट हो जाते हैं और जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है। पुराणों के अनुसार, कामदा एकादशी का व्रत करने से न केवल इस जन्म के बल्कि पूर्व जन्म के पाप भी समाप्त होते हैं और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।
पूजा की विधि
पूजा के दिन सुबह जल्दी उठकर ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें. यदि संभव हो तो इस दिन पीले रंग के वस्त्र पहनें, इसे शुभ माना जाता है। इसके बाद पूजा घर की सफाई करें और गंगाजल का छिड़काव करें. फिर बैठकर हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प लें। इसके बाद एक चौकी लें और उस पर लाल या पीले रंग का कपड़ा बिछाएं. भगवान विष्णु की तस्वीर या प्रतिमा स्थापित करें. उन्हें पीले फूल, फल, अक्षत और चंदन अर्पित करें. फिर धूप-बत्ती, अगरबत्ती और दीपक जलाएं। भगवान विष्णु को भोग लगाएं. तुलसी दल उन्हें अत्यंत प्रिय है, इसलिए भोग में इसे अवश्य शामिल करें. ध्यान रहे कि एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते नहीं तोड़ने चाहिए, इन्हें एक दिन पहले ही तोड़कर रख लें. इसके बाद भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप करें.
कामदा एकादशी की व्रत कथा पढ़ें या सुनें और अंत में विष्णु जी की आरती करें. शाम को दीपदान करें और अगले दिन पारण करें।





