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जैन दर्शन के सिद्धांत आज भी मानवता के लिए प्रासंगिक

जैन दर्शन और साहित्य विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न

लखनऊ। उत्तर प्रदेश जैन विद्या शोध संस्थान, लखनऊ तथा बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय (बीबीएयू) के हिंदी प्रकोष्ठ के संयुक्त तत्वावधान में तीर्थंकर ऋषभदेव जन्म कल्याणक के अवसर पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी जैन दर्शन और साहित्य : समकालीन संदर्भ में का समापन शुक्रवार को अम्बेडकर सामाजिक विज्ञान विद्यापीठ सभागार में हुआ।
तृतीय अकादमिक सत्र की अध्यक्षता बीबीएयू के शिक्षाशास्त्र विभागाध्यक्ष प्रो. राजशरण शाही ने की। मुख्य वक्ता प्रो. सत्येंद्र कुमार दुबे ने कहा कि जैन दर्शन के अहिंसा और अपरिग्रह के सिद्धांत आज के सामाजिक जीवन में अत्यंत प्रासंगिक हैं। डॉ. रमेशचंद्र नैनवाल ने जैन चिंतन को भारतीय ज्ञान परंपरा से जोड़ते हुए उसके उपयोगितावादी पक्ष पर प्रकाश डाला, जबकि डॉ. जय सिंह यादव ने जैन परंपरा को चरित्र निर्माण की परंपरा बताया। सत्र का संचालन शशि प्रकाश पाठक ने किया।
चतुर्थ अकादमिक सत्र में लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रो. योगेंद्र प्रताप सिंह ने जैन दर्शन को भारतीय ज्ञान परंपरा, साहित्य और कला से जोड़ते हुए उसकी व्यापकता पर चर्चा की। विशिष्ट वक्ता डॉ. डिम्पल जैन और डॉ. पत्रिका जैन ने भी अपने विचार रखे। सत्र का संचालन बीबीएयू हिंदी विभाग की सहायक आचार्य डॉ. प्रीति राय ने किया।
समापन सत्र में लखनऊ विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष एवं भारतीय हिंदी परिषद, प्रयाग के सभापति प्रो. पवन अग्रवाल ने कहा कि आज के दौर में बढ़ती आर्थिक और सामाजिक असमानता के बीच जैन दर्शन का अपरिग्रह सिद्धांत संतुलित और न्यायपूर्ण समाज की राह दिखाता है। मुख्य अतिथि नई दिल्ली के प्रो. नलिन के. शास्त्री ने जैन दर्शन में अहिंसा, संयम और करुणा को जीवन का मूल तत्व बताया, जबकि बीज वक्ता लखनऊ के प्रो. अभय कुमार जैन ने जैन साहित्य को भारतीय ज्ञान परंपरा की महत्वपूर्ण धरोहर बताया। कार्यक्रम की अध्यक्षता बीबीएयू के कुलपति प्रो. राजकुमार मित्तल ने की। अतिथियों का स्वागत बीबीएयू हिंदी विभाग के सहायक आचार्य एवं राजभाषा हिंदी प्रकोष्ठ के सहायक निदेशक डॉ. बलजीत कुमार श्रीवास्तव ने किया। आयोजन में उत्तर प्रदेश जैन विद्या शोध संस्थान के निदेशक अमित कुमार अग्निहोत्री तथा संस्कृति विभाग के विशेष सचिव संजय कुमार सिंह का विशेष सहयोग रहा। संगोष्ठी में बड़ी संख्या में शिक्षक, शोधार्थी और विद्यार्थी उपस्थित रहे।

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