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जीना सिखा दे…की प्रस्तुति ने ‘मायण’ महोत्सव को बनाया खास

इस तरह के आयोजन समाज को उनके समीप लाते हैं : असीम अरुण
लखनऊ। मायण महोत्सव हमारे जीवन में हमारी मां की भूमिका की स्तुति करने के उद्देश्य से लखनऊ के इटौंजा क्षेत्र के एक गांव गदेला में हर साल आयोजित होने वाला एक वार्षिक उत्सव है, जो शहर और गांव दोनों संस्कृतियों को एक ही मंच पर मिलाने का एक ठोस प्रयास है। यह चौथा सफल संस्करण था। इसके पीछे एक अन्य प्रमुख उद्देश्य लोगों को हमारे बीच के उन वर्गों के करीब लाना भी रहा है जिन्हें विधाता ने विशेष रूप से चुनौतियों के साथ इस दुनिया में भेजा है। इस वर्ष का कार्यक्रम दृष्टिबाधित दिव्यांगों की सेवा में समर्पित रहा।
बता दें कि राजस्थान की बोली में मायण का मतलब मां होता है। माँ नि:स्वार्थ प्रेमए त्यागए प्रेरणा और क्षमा का प्रतीक होती है। वास्तव में वह इस धरा पर भगवान का निकटतम प्रतिबिंब यदि कोई है तो वह माता के अतिरिक्त कोई और नहीं हो सकता है।
कार्यक्रम का शुभारम्भ मंत्री समाज कल्याण असीम अरुण के द्वारा किया गया। शुरूआत जीना सिखा दे… गीत से हुई जहां दिव्यांगों ने मंच पर आकर सभी का स्वागत किया, और महोत्सव को खास बना दिया। दिव्यांग जन ने उन्हें ब्रेल की एक पुस्तक भेंट की जो बशीर बद्र जी की शायरी से सम्बंधित थी। मुख्य अतिथि असीम अरुण ने अपने संबोधन में ऐसे प्रयासों की सराहना करते हुए शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच अधिक सार्थक संगम की आवश्यकता के अलावा दिव्यांगों की भलाई के लिए एक बड़ी सामाजिक प्रतिक्रिया की आवश्यकता पर ध्यान केंद्रित किया। इस कार्यक्रम का मूल उद्देश्य दिव्यांग बंधुओं के जीवन को और अधिक आसानए गरिमा.पूर्ण और सामाजिक रूप से आनंदमयी बनाना था।
अरुण ने संदीप मिश्र सहित दिव्यांग जन के हौसले की तारीफ की और बोला कि इस तरह के आयोजन समाज को उनके समीप लाते हैं। जननी को केंद्र मानकर हम सम्पूर्ण सृष्टि का आह्वान करते हैं। नगरीय एवं ग्रामीण पटल का यह परस्पर मिलन अदभुत है। इसके बाद बीएसएफ योद्धा संदीप का अभिनंदन किया गया, जिन्होंने आतंकवादी तत्वों का बहादुरी से मुकाबला करते हुए एक भीषण आॅपरेशन के दौरान अपनी आंखों की रोशनी खो दी थी। जिसके लिए कृतज्ञ राष्ट्र ने उन्हें राष्ट्रपति के वीरता पदक से सम्मानित किया। उसके बाद मीट वेलफेयर फाउंडेशन एमडब्ल्यूएफ के दृष्टिबाधित दिव्यांगों के एक समूह द्वारा अनेकों प्रदर्शन किए गए। यह बहुत ही हृदयस्पर्शी कार्यक्रम था जिसने उपस्थित लोगों का ध्यान अपनी ओर पूर्णतया आकर्षित कर लिया। अंत में दिव्यांग योद्धाओं के सम्मान में लखनऊ की प्रसिद्ध गजलकारा डॉ० प्रभा श्रीवास्तव ने भावपूर्ण मधुर गजलें प्रस्तुत कीं।
रोहित मीत ने अपने संबोधन में बताया कि मीत वेलफेयर फाउंडेशन वर्तमान में दृष्टिबाधित बच्चों के लिए आवश्यक संस्थागत सुविधाएं और सामाजिक अवसर प्रदान करने में सक्रिय रूप से शामिल है। इसके अलावाए उनकी संस्था दृष्टिबाधितों और अन्य शारीरिक विकलांगताओं वाले दिव्यान्गों हेतु आवश्यक सुलभ बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए विभिन्न सरकारी विभागों के साथ भी काम करता है। इसमें बड़ी संख्या में स्थानीय ग्रामीण लोगों के अलावा शहर के कई गणमान्य लोग भी शामिल हुए। इसमें डॉ. रवि भट्ट, विजय प्रताप साही, कीर्ति नारायण, गोपाल सिन्हा, अरविंद मिश्रा, अजय जायसवाल, डॉ. सुनील कुमार, डॉ. विनय गर्ग, डॉ. पंकज गुप्ता, कनक चौहान, पदमश्री रूना बनर्जी, विनीता मिश्रा, फकरे आजम, विपुल वार्ष्णेय, नवीन जोशी, डॉ. संदीप कुमार, कुमकुम रे, कर्नल नीरज श्रीवास्तव, सुधांशु मणि, एयर मार्शल अमित तिवारी, अनुराग डिडवानिया और जय कृष्ण अग्रवाल शामिल थे। महोत्सव ने दो विविध संस्कृतियों के आकर्षक मिश्रण से शहर से पधारे अथितियों को ओजपूर्ण और मंत्रमुग्ध कर दिया। इसमें कोई संदेह नहीं कि यह कार्यक्रम अपनी अनूठी सादगी के साथ.साथ अपने उद्देश्य की गंभीरता के लिए भी विशिष्ट रहा। ग्रामीण व्यंजनों का भी मेहमानों ने भरपूर लुत्फ लिया।
इस मिशन के प्रणेता डॉ. आनंद प्रकाश माहेश्वरी सेवानिवृत्त डीजी सीआरपीएफ की प्रेरणा और मार्गदर्शन में यह कार्यक्रम लगातार शहर और गांव के लोगों के बीच संगम का एक सफल मंच बना हुआ है। इसे कुछ प्रमुख लोगों का समर्थन मिला जिनमें अखिलेश और वंदना अग्रवाल, राजेश और सीमा बंसल, दया और मधु माहेश्वरी, बिमल एवं आरती माहेश्वरी, अरुण और निशा अग्रवाल, परितोष और कनक चौहान, रोहित मीत, चंद्र शेखर वर्मा और डॉ प्रभा श्रीवास्तव प्रमुखतया शामिल हैं। लखनऊ एक्सप्रेशन सोसाइटी तथा लखनऊ साहित्य मंच ने नैतिक समर्थन प्रदान किया।
यहां यह उल्लेख करना प्रासंगिक होगा कि गांवों के युवाओं और महिलाओं ने पिछले वर्षों में भी इस महोत्सव में अपने प्रदर्शन के माध्यम से अपनी आकांक्षाओंए पर्यावरणीय मुद्दोंए पोषण की गुणवत्ताए बच्चों में कैंसर की देखभाल आदि विषयों के बारे में अपनी चिंताओं को उन्मुक्त रूप से प्रदर्शित किया है। कुछ प्रसिद्ध सदस्यों के कुशल मार्गदर्शन में कबीर की शिक्षाओं और अन्य प्रासंगिक मुद्दों पर भी कार्यक्रम आयोजित किए गए थे।

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