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बंगाल का सत्ता संघर्ष

ममता बनर्जी 2011 में जब साढ़े तीन दशक पुराने ‘वामपंथी स्टेब्लिशमेंट’ को ध्वस्त कर बंगाल पर काबिज हुई थीं तो उनकी राजनीतिक दृढ़ता को पूरे देश ने स्वीकारा था। बंगाल में वामपंथियों का लंबा शासन इसलिए चला क्योंकि उन्होंने भूमि सुधारों के जरिए जनता के बीच पैठ बनायी और फिर गांव-गांव तक वामपंथी कॉडर तैयार कर ऐसा वर्ग खड़ा कर दिया जो राजनीतिक विरोधियों से किसी भी हद तक जाकर निपटने के लिए हमेशा तैयार रहता था।

कांग्रेस वामपंथियों के सामने हथियार डाल चुकी थी और भाजपा अपने आदर्श डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की भूमि को ललचायी नजरों से चुपचाप निहारती हुई वह तरकीब खोज रही थी जिससे लाल किले में सेंध कर महलों के शहर में रॉयटर्स बिल्डिंग पर केसरिया फहराया जा सके। ममता बनर्जी कांग्रेस में रहते हुए सीपीआईएम कॉडर से जूझना चाहती थीं लेकिन प्रणब मुखर्जी, प्रियरंजन दास मुंशी, गनी खान चौधरी और सोमेन्द्र नाथ मित्रा जैसे दिग्गज कांग्रेसियों की चौकड़ी के सामने उनकी एक चलती नहीं थी।

ऐसे में जब ममता दीदी ने 1997 में कांग्रेस से 27 साल पुराना नाता तोड़ा और मुकुल राय के साथ तृणमूल कांग्रेस पार्टी बनायी तो भाजपा वामपंथी किले को भेदने के लिए ममता के साथ खड़ी हो गयी। महज दो साल बाद ममता को अटल बिहारी वाजपेयी ने रेलमंत्री बनाकर मिशन बंगाल के लिए नयी ऊर्जा दी और साथ में रेलवे के संसाधन भी राजनीतिक मिशन पर झोंकने की खुली छूट मिल गयी।

ममता बनर्जी को अटल बिहारी वाजपेयी के उदार नेतृत्व से काफी बल मिला और वामपंथियों से एक दशक तक चले रक्तरंजित संघर्ष के बाद आखिरकार 2011 में ममता बनर्जी को बंगाल की सत्ता मिल गयी। 2016 में तृणमूल कांग्रेस को दूसरी बार और तगड़ी जीत मिली और वे मजबूत होती गयीं। जैसे-जैसे ममता बनर्जी का कद बढ़ा तो दिल्ली की दावेदारी पर भी अटकलें लगायी जाने लगीं। 2019 के लोकसभा चुनाव में विपक्ष के तमाम दावेदारों के साथ ममता बनर्जी का नाम भी पीएम के लिए लिया जाने लगा और इस तरह भाजपा और टीएमसी आमने-सामने आ गये।

ममता बनर्जी के उत्थान में भाजपा का बड़ा हाथ रहा है और इसलिए भाजपा ममता के हर हथकंडे को अच्छी तरह जानती है। कभी सत्ता बचाने के लिए विपक्ष के साथ जो हिंसक राजनीति वामपंथियों ने की और आखिर में परास्त हुए, आज वही राजनीति बंगाल में ममता बनर्जी अपनी सत्ता बचाने के लिए कर रही हैं। लेकिन उनके सामने विपक्ष के रूप में भाजपा है जिसकी मजबूती, मशीनरी और लोकप्रियता पर फिलहाल कोई सवाल नहीं उठा सकता।

भाजपा अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा पर बंगाल यात्रा के दौरान जिस 24 परगना जिले के डायमंड हार्बर में हमला हुआ वह ममता बनर्जी के भतीजे और सबसे भरोसेमंद अभिषेक बनर्जी का संसदीय क्षेत्र है। अपने अध्यक्ष पर हुए हमले के बाद भाजपा जहां एक तरफ ममता बनर्जी पर हमलावर है वहीं जनता के बीच विक्टिम कार्ड खेल रही है। बंगाल में टीएमसी और भाजपा के बीच जो राजनीतिक संघर्ष चल रहा है वह दरअसल अगले साल अपै्रल-मई में प्रस्तावित चुनावों का ट्रेलर है। बंगाल की राजनीति में हिंसा, तोड़फोड़ और हत्याएं आम बात हैं।

2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा 18 सीटें और 40 फीसद से अधिक मत के साथ 120 विधानसभा सीटों पर बढ़त हासिल कर चुकी है। भाजपा को बंगाल की सत्ता नजदीक दिखती है और ममता अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष कर रही हैं। यह सत्ता संघर्ष और बढ़ेगा। इस खूनी संघर्ष में ममता जीतें या भाजपा, लेकिन संविधान और लोकतंत्र की निश्चित हार होगी।

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