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यूएपीए मामले में शरजील इमाम की जमानत याचिका पर अपना रुख बताए पुलिस : सुप्रीम कोर्ट

नयी दिल्ली। दिल्ली उच्च न्यायालय ने दिल्ली दंगों के पीछे कथित ‘बड़ी साजिश’ से जुड़े मामले में गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत दर्ज मामले में छात्र कार्यकर्ता शरजील इमाम की जमानत याचिका पर शुक्रवार को दिल्ली पुलिस का पक्ष जानना चाहा।

न्यायमूर्ति प्रतिभा एम. सिंह और न्यायमूर्ति विकास महाजन की पीठ ने इमाम की अपील पर नोटिस जारी किया। इस अपील में अधीनस्थ अदालत के चार जुलाई के उस फैसले को चुनौती दी गई थी जिसमें इमाम की दूसरी नियमित जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी।पीठ ने दिल्ली पुलिस को अपील का जवाब दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया और मामले की सुनवाई के लिए 27 अगस्त की तारीख तय की।

इमाम को 25 अगस्त 2020 को गिरफ्तार किया गया था। छात्र नेता पर यूएपीए के तहत मामला दर्ज किया गया था। इमाम पर उत्तर-पूर्वी दिल्ली में फरवरी 2020 के दंगों के ‘मास्टरमाइंड’ में से एक होने का आरोप था। इन दंगों में 53 लोगों की मौत हुई थी और 700 से अधिक लोग घायल हुए थे।नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2019 और राष्ट्रीय नागरिक पंजी के विरोध प्रदर्शनों के दौरान हिंसा भड़की थी।

अधीनस्थ अदालत ने इमाम की जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा कि उसके पास उच्चतम न्यायालय के पांच जनवरी के आदेश का पालन करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है और इसलिए वह न तो याचिका पर विचार कर सकती है और न ही जमानत दे सकती है। अधीनस्थ अदालत ने कहा कि जमानत याचिका उसके समक्ष सुनवाई योग्य ही नहीं है।

उच्च न्यायालय में अपनी अपील में इमाम ने कहा कि अधीनस्थ अदालत ने नियमित जमानत याचिका पर स्वतंत्र रूप से विचार करने से इनकार करके गलती की है। याचिका में कहा गया है कि छह साल बीत जाने के बाद भी अधीनस्थ अदालत में कार्यवाही अब तक आरोप तय करने पर होने वाली बहस के चरण से आगे नहीं बढ़ सकी है।

उच्चतम न्यायालय ने पांच जनवरी को बड़ी साजिश के मामले में उमर खालिद और इमाम की जमानत याचिका खारिज कर दी जबकि सह-आरोपी गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा-उर-रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को राहत दी।

न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ ने कहा कि खालिद और इमाम के खिलाफ यूएपीए के तहत प्रथम दृष्टया मामला बनता है और यह भी कहा कि भागीदारी के स्तर को देखते हुए सभी आरोपियों के साथ एक जैसा व्यवहार नहीं किया जा सकता।

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