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लॉकडाउन में भी किसानों को सहभागिता से मिली राह

लखनऊ। कोविड महामारी के इस दौर में किसानों की आजीविका बुरी तरह से प्रभावित हुयी है। ऐसे समय में स्वयं सहायता समूह वैज्ञानिकों के मार्गदर्शन में न केवल आय प्राप्त कर रहे हैं बल्कि कोविड से जुड़े निदेर्शों का पालन कर रहे हैं। किसानों को आत्मनिर्भर बनाने के लिये संस्थान ने एक स्वयं सहायता समूह सहभागिता बनाया जिसमें 25 किसानों ने भागीदारी की।

संस्थान द्वारा उन्हें एक सामुदायिक हैचरी दी गयी। जहां एक ओर बरायलर चिकन उधोग लॉकडाउन में बुरी तरह प्रभावित हो चुका है वहीं ग्रामीण मुर्गी उद्योग इससे ज्यादा प्रभावित नहीं हुआ है। देशी मुगरी का वजन जहां धीरे बढ़ता है वहीं वह अपना भोजन कीटों, खरपतवार के बीजों एवं सड़े गले अनाज एवं सब्जियों से प्राप्त करते हैं जिससे किसानों पर ज्यादा बोझ नहीं पड़ रहा है। किसान कडकनाथ और निर्भीक जैसी किस्मों के बच्चे लॉकडाउन में तैयार कर रहे हैं। इन किस्मों का बाजार इन हालातों में बेहतर दिखाई दे रहा है।

बरायलर की उम्र बेहद सीमित होने के साथ इनकी खुराक का खर्च ज्यादा आता है साथ ही इनकी दवाइयों का खर्च भी ज्यादा आता है। देशी मुर्गियों में रोगों के प्रति रोधातमक क्षमता होती है साथ ही पोषण पर खर्च कम आता है। आपदा की इस हालत में किसानों के लिए ये बेहद लाभप्रद साबित हो रही है। डा. शैलेंद्र राजन ने बताया कि आम बागवानों की आय बढ़ाने के लिए मलिहाबाद में दो वर्ष पूर्व आम आधारित मुर्गी पालन की शुरूआत फार्मर फर्स्ट परियोजना के अंतर्गत की गयी थी। किसानों को भारतीय पंक्षी अनुसंधान संस्थान, बरेली से ला कर बाग में सफलतापूर्वक चलने वाली किस्में जैसे कारी-निर्भीक, कडकनाथ, अशील, कारी देवेन्द्र इत्यादि दी गयी।

विसंक्रमित अंडों को बेचकर कमाई कर रहे किसान

महामारी के इस दौर में जब बाकी किसान भयभीत है, सहभागिता को बीमारी से बचाव के लिए परियोजना के प्रधान अन्वेषक डा. मनीष मिश्र ने कार्य के समय सामाजिक दूरी के लिये प्रेरित किया। साथ ही किसानों को मास्क एवं सैनेटाइजर दिये। हैचरी प्रबंधन के लिए किसानों की एक टीम पक्षी अनुसंधान, बरेली में प्रशिक्षण प्राप्त कर चुकी है। सहभागिता के किसान न केवल हैचरी को सैनेटाइज कर रहे हैं बल्कि पूरी तरह से विसंक्रमित अंडों को बेच रहे हैं और इस आपदाकाल में धन अर्जन कर रहे हैं। सहभागिता का अपना बैंक खाता है जिसके माध्यम से ये अपना व्यापार कर रहे हैं। डा. राजन बताते हैं कि आने वाले समय में स्वयं सहायता समूहों और एफपीओ की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। आपदा के समय खेती में किसानों को समूह में जुड़ना बेहद महत्वपूर्ण होगा।

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