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चीन पर आर्थिक प्रहार

एलएसी पर चीन की हरकतों को माकूल जवाब देने और भारत की जमीन पर बुरी नजर रखने वाले ड्रैगन को सबक सिखाने के लिए भारत सरकार ने एक और बड़ा कदम उठाते हुए भारत के साथ सीमा साझा करने वाले देशों की कंपनियों को सरकारी खरीद एवं सरकारी ठेकों में सीधे शामिल होने से रोक दिया है।

भारत सरकार ने यह फैसला चूंकि रक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा के मद्देनजर उठाया है और सीधे चीन का जिक्र भी नहीं किया गया है इसलिए अगर चीन इस फैसले के खिलाफ विश्व बैंक या अन्य अंतर्राष्ट्रीय फोरम पर जाता है तो भी उसे राहत नहीं मिलेगी, क्योंकि व्यापक तौर पर यह भारत की सुरक्षा चिताओं से जुड़ा फैसला है और सीधे तौर पर चीन के खिलाफ नहीं हैं। हां यह अलग बात है कि इसका निशाना चीन पर लगेगा और चीन इससे बहुत तिलमिलायेगा।

चीन जिस तरह हमेशा भारत के खिलाफ साजिश करता रहा है ऐसे में देश को ऐसा कुछ भी नहीं करना चाहिए जिससे चीन को फायदा हो। चीन करीब सत्तर अरब डॉलर भारत को निर्यात करता है। अगर सरकार के साथ ही आम नागरिक चीनी उत्पादों से दूरी बनाते हैं तो निश्चित रूप चीन को बहुत बड़ा झटका लगेगा और यह सही मायने देशभक्ति होगी। 15-16 जून की रात गलवान में जिस तरह भारत के निहत्थे जवानों पर हमला किया और 20 जवानों को शहीद कर दिया, उसके बाद दरअसल चीन किसी भी तरह की रियायत का हकदार नहीं है।

भारतीयों और भारत सरकार को वह हर कदम उठाना चाहिए जिससे चीन पतन की ओर जाये। क्योंकि चीन एक शातिर और दुश्मन देश है और इससे भविष्य में कभी भी दोस्ती का राग छेड़ने की बजाय हमेशा सतर्क रहते हुए ऐसे कदम उठाने हैं जिससे चीन को नुकसान पहुंचे। गलवान झड़प के बाद भारत सरकार और आम नागरिकों ने चीनी उत्पादों का बहिष्कार शुरू किया है। इसी कड़ी में बीते मई महीने में भारतीयों कंपनियों में चीनी निवेश को रोकने के लिए पड़ोसी देशों की कंपनियों के सीधे निवेश पर प्रतिबंध लगाकर सरकारी मंजूरी जरूरी कर दी गयी थी।

गलवान झड़प के बाद रेलवे, दूर संचार सहित कई राज्य सरकारों ने अपनी परियोजनाओं से चीन की कंपनियों को बाहर कर दिया है। अब केन्द्र सरकार ने बाकायदा एक नीति को मंजूरी दी है जिसमें सरकारी खरीद एवं ठेकों में सीमा साझा करने वाले पड़ोसी देशों की कंपनियों को सीधे भागीदारी करने से रोक लगा दी गयी है।

नये नियम के दायरे में केन्द्र एवं राज्य सरकार के सभी ठेकों, पीएसयू के ठेकों एवं खरीद के साथ पीपीपी परियोजनाएं भी इसके दायरे में आयेंगी। अब सरकारी ठेकों व खरीद में पड़ोसी देशों की कंपनियां को शामिल होने के लिए कम्पीटेन्ट अथॉरिटी में रिजस्टर्ड होने के साथ विदेश एवं गृह मंत्रालय से राजनीतिक सुरक्षा संबंधी स्वीकृति भी लेनी अनिवार्य होगी। जाहिर है कि सरकार किसी चीनी कंपनी को तभी स्वीकृति देगी जबकि उसकी सेवाएं लेना राष्ट्रहित में बहुत जरूरी होगा।

केन्द्र सरकार नेचीनी कंपनियों पर लगाम लगाने के लिए जो नये नियम लागू करने की घोषणा की है उससे स्पष्ट है कि भारत सरकार किस हद तक चीन की हरकतों को लेकर गंभीर है। पूर्व में भले ही चीन को लेकर बहुत गलतियां हुई हों लेकिन अब शायद सरकार और चूक करने को तैयार नहीं है। इसीलिए सेना को आधुनिक साजो सामान से लैस करने, सीमा पर लगातार निगरानी करने के साथ चीन के आर्थिक हितों पर भारत सरकार लगातार प्रहार कर रही है।

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