लखनऊ। हिंदू धर्म में अक्षय तृतीया के पर्व का खास महत्व होता है। इसे अत्यंत ही शुभ दिन माना जाता है। हर साल वैशाख मास की शुक्ल पक्ष तृतीया तिथि को मनाया जाता है। इस दिन अबूझ मुहूर्त होता है। इसका अर्थ है कि बिना पंचांग देखे भी विवाह, गृह प्रवेश, भूमि पूजन, नए व्यवसाय की शुरूआत और अन्य मांगलिक कार्य किए जा सकते हैं। साल 2026 में अक्षय तृतीया 19 अप्रैल 2026, रविवार को मनाई जाएगी। ग्रंथों में इसे महापर्व बताया गया है। पुराणों का कहना है, इस दिन किए गए कामों से अक्षय पुण्य मिलता है। इस दिन स्नान-दान और पूजा-पाठ का खास महत्व होता है।
दान का महत्व
अक्षय तृतीया के दिन दान को श्रेष्ठ माना गया है। चूंकि वैशाख मास में सूर्य की तेज धूप और गर्मी चारों ओर रहती है और यह आकुलता को बढ़ाती है तो इस तिथि पर शीतल जल, कलश, चावल, चना, दूध, दही आदि खाद्य पदार्थों सहित वस्त्राभूषणों का दान अक्षय व अमिट पुण्यकारी होता है। मान्यता है कि इस दिन 14 तरह का दान करना बेहद शुभ फलदायी माना जाता है।
अक्षय तृतीया के दिन करें 14 तरह के दान
गौ, भूमि, तिल, स्वर्ण, घी, वस्त्र, धान्य, गुड़, चांदी, नमक, शहद, मटकी, खरबूजा, कन्या।
व्रत-पूजा से लाभ
अक्षय तृतीया के दिन व्रत रखकर विधि-विधान से पूजा करना अत्यंत शुभ माना जाता है। इस अवसर पर भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की आराधना विशेष फलदायी होती है। साथ ही इस दिन नई वस्तुओं, खासकर सोने के आभूषणों की खरीदारी को भी बहुत शुभ माना गया है। मान्यता है कि सच्चे मन से पूजा-पाठ करने पर भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है, जिससे धन, समृद्धि के साथ-साथ बुद्धि और विद्या का आशीर्वाद भी मिलता है। धार्मिक कथाओं के अनुसार, इसी दिन कुबेर देवता ने देवी लक्ष्मी से धन की कामना की थी, जिससे प्रसन्न होकर मां लक्ष्मी ने उन्हें अपार धन-संपत्ति और ऐश्वर्य का वरदान दिया था।
अक्षय तृतीया का महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस पावन तिथि की गणना प्राचीन युगों से चली आ रही है। माना जाता है कि अक्षय तृतीया के दिन ही त्रेतायुग का आरंभ हुआ था, जबकि इसी तिथि पर द्वापर युग का समापन भी हुआ। इसके अलावा, यह दिन अवतारों और दिव्य घटनाओं के लिए भी विशेष महत्व रखता है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान परशुराम का अवतार हुआ था और ब्रह्माजी के पुत्र अक्षय कुमार का भी प्राकट्य इसी तिथि को हुआ था। इसलिए अक्षय तृतीया को अत्यंत शुभ और पुण्यदायी दिन माना जाता है।
गंगा अवतरण
धार्मिक ग्रंथ नारद पुराण के अनुसार, इस पावन दिन स्वर्ग से प्रचंड वेग के साथ अवतरित हुई गंगा नदी को भगवान शिव ने अपनी जटाओं में धारण कर उनके वेग को नियंत्रित किया था। इसके बाद अक्षय तृतीया के शुभ अवसर पर गंगा पृथ्वी पर अवतरित होकर कैलाश से प्रवाहित हुईं।
परशुराम अवतार
इसी तिथि पर महर्षि जमदग्नि के पुत्र भगवान परशुराम का जन्म हुआ था। अक्षय तृतीया के दिन जन्म लेने के कारण उन्हें चिरंजीवी माना जाता है, यानी वे अमर हैं और मान्यता है कि कलियुग में भी वे किसी न किसी रूप में विद्यमान हैं।





