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युद्धोपरांत की विभीषिका को दर्शाता नाटक अंधयुगम

संस्था विजय बेला एक कदम खुशियों की ओर के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित
लखनऊ। उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान एवं संस्था विजय बेला एक कदम खुशियों की ओर के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित एकमासात्मक संस्कृत नाट्य कार्यशाला के उपरांत धर्मवीर भारती जी की कालजई रचना अंधायुग का मंचन संस्कृत भाषा में आज ओजस प्रेक्षागृह, डोमिनेंस इंटरनेशन स्कूल, चिनहट में किया गया। कार्यक्रम का सुभारम्भ साहित्यकार महेन्द्र भीष्म जी एवं मुख्य अभियंता अरविंद जैन जी ने दीप प्रज्ज्वलन करके किया। डॉ नवलता जी के द्वारा संस्कृत में अनुवादित एवं चन्द्रभाष सिंह द्वारा निर्देशित नाटक को कलाकारों ने अपने अभिनय से जीवंत बना दिया। वर्तमान में हो रहे वैश्विक युद्धों के खतरों को देखते हुए नाटक की प्रस्तुति अधिक प्रासंगिक हो गई। नाटक में दिखाया गया कि जब-जब स्वार्थ बस मयार्दा तोड़ी गई तब-तब महाविनाश हुआ है। नाटक में पौराणिक कथा के माध्यम से आधुनिक भाव बोध को स्थापित किया गया है। इस नाटक में अमर्यादित और अनैतिक आचरण का विरोध दिखाई देता है। नाटक में यह भी दिखाया गया है कि संभ्रांत वर्ग के व्यक्तियों की चुप्पी से पड़ने वाला प्रभाव कितना भयानक हो सकता है। नाटक कर्म योग का संदेश भी देता है, मानव भविष्य निर्धारित नहीं है, मानव अपने कर्मों से भविष्य को बदल सकता है। नाटक के अनुसार महासंग्राम के बाद विजय एक लंबा धीमा और तिल-तिल कर फलीभूत होने वाला आत्म घात है। मंच पर जूही कुमारी, निहारिका कश्यप, कोमल प्रजापति, विशाल श्रीवास्तव, रूपेश कुमार, अर्पित मोदनवाल, भानु प्रताप, आर्यन, विदुषी तिवारी, प्रेरणा गौड़, प्रिंस सिंह, आशुतोष सिंह,कृष्ण कुमार पांडेय आदि ने अभिनय किया, वहीं पार्श्व संगीत चन्द्रेश पांडेय, सह निर्देशन जूही कुमारी का था। एक महीने की इस कार्यशाला में प्रशिक्षणार्थियों को डॉ. आनन्द दीक्षित जी के द्वारा संस्कृत का प्रशिक्षण दिया गया।

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