लखनऊ। पीलीभीत टाइगर रिजर्व (पीटीआर) आज सिर्फ रुहेलखंड ही नहीं, बल्कि दुनिया में बाघों के दर्शन और पर्यटन के लिए अलग पहचान बना चुका है। यहां आने वाले सैलानियों के लिए बाघ का दीदार लगभग तय माना जाता है। इस रिजर्व से जुड़ा एक और पहलू है, जो बहुत कम लोगों को पता है। यहां के कुछ बाघ ऐसे हैं, जिन्हें जंगल से रेस्क्यू के बाद दोबारा आजादी नहीं मिल सकी और उन्हें चिड़ियाघरों में उम्रकैद की जिंदगी गुजारनी पड़ी।
पीटीआर के बाघों का मिजाज अन्य टाइगर रिजर्व से कुछ अलग बताया जाता है। कई बाघ ऐसे हैं जो आबादी के नजदीक रहने के बावजूद इंसानों को नुकसान नहीं पहुंचाते। लेकिन कुछ मामलों में जंगल में अनाधिकृत रूप से घुसने वालों पर हमले की घटनाएं भी सामने आईं। ऐसे मामलों में वन विभाग को बाघों को रेस्क्यू कर जंगल से बाहर करना पड़ा। यही वजह है कि बीते 11 वर्षों में यहां के 11 बाघ-बाघिनों को जंगल से बाहर जू भेजना पड़ा, जिसे वन विभाग की भाषा में उम्रकैद कहा जा रहा है।
पीलीभीत टाइगर रिजर्व के आंकड़ों के अनुसार रिजर्व घोषित होने के बाद वर्ष 2014 से अब तक कुल 26 रेस्क्यू आॅपरेशन किए गए। इन अभियानों में पांच शावकों समेत कुल 23 बाघ-बाघिनों को पकड़ा गया। इसके अलावा छह तेंदुओं को भी पकड़ा गया। रेस्क्यू बाघों में 12 को निगरानी और जांच के बाद दोबारा जंगल में छोड़ दिया गया। लेकिन, अन्य 11 बाघ-बाघिन की जंगल में वापसी नहीं हो सकी। ये उम्रकैद काटने विभिन्न चिड़ियाघरों में भेज दिए गए।
कानपुर, गोरखपुर और लखनऊ के चिड़ियाघरों में भेजे गए बाघ
पकड़े जाने के बाद 11 बाघ-बाघिनों को लखनऊ, गोरखपुर और कानपुर के चिड़ियाघरों में भेजा गया। ये सभी अब वहां मजबूत जाल और चहारदीवारी के पीछे जीवन बिता रहे हैं। गोरखपुर भेजे गए पीटीआर के चर्चित केसरी बाघ की बीमारी के चलते मौत हो चुकी है। हाल ही में कानपुर भेजा गया एक बाघ इन दिनों वहां के दर्शकों के बीच आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।
पीटीआर से कानपुर चिड़ियाघर भेजे गए एक बाघ को बघीरा नाम दिया गया है। बताया जाता है कि बघीरा खुले तौर पर सामने आता है। उसकी चाल-ढाल व अदाएं सैलानियों को खासा प्रभावित करती हैं। चिड़ियाघर में आने वाले पर्यटक सबसे पहले बघीरा को देखने की इच्छा जताते हैं।





