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UP ने फार्मर आईडी बनाने में दक्षता का लोहा मनवाया, केंद्र ने 20 मई तक बढ़ाई समय सीमा

लखनऊ। उत्तर प्रदेश ने एक बार फिर कृषि के क्षेत्र में अपनी प्रशासनिक कुशलता और तकनीकी दक्षता का लोहा मनवाया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में प्रदेश ने डिजिटल कृषि के मिशन को धरातल पर उतारते हुए फार्मर आईडी यानी किसान पहचान पत्र बनाने के मामले में देश के अन्य राज्यों के सामने एक बड़ी मिसाल पेश की है।

राजधानी लखनऊ में बीते दिन हुए क्षेत्रीय कृषि सम्मेलन में केंद्र सरकार की ओर से न केवल उत्तर प्रदेश की पीठ थपथपाई, बल्कि इसे अन्य राज्यों के लिए एक अनुकरणीय मॉडल के रूप में भी प्रस्तुत किया। कृषि मंत्रालय के अपर सचिव प्रमोद कुमार ने सम्मेलन को संबोधित करते हुए स्पष्ट किया कि, जिस गति से उत्तर प्रदेश ने किसानों को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लाने का काम किया है, वह देश की कृषि व्यवस्था में पारदर्शिता और सटीकता लाने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम है। केंद्र ने अब इस प्रक्रिया को और विस्तार देते हुए 20 मई तक का समय निर्धारित किया है, जिसके भीतर उन जमीनों या अनक्लेम्ड प्लॉटों को भी फार्मर आईडी से जोड़ा जाएगा जिन पर वर्तमान में किसी का मालिकाना हक स्पष्ट नहीं है।

लखनऊ के सम्मेलन में प्रस्तुत किए गए आंकड़े उत्तर प्रदेश की सफलता की कहानी खुद बयां कर रहे हैं। भारत सरकार के कृषि मंत्रालय के अनुसार, देशभर के 19 राज्यों में अब तक कुल 9.4 करोड़ फार्मर आईडी बनाई जा चुकी हैं, जिनमें अकेले उत्तर प्रदेश का योगदान सबसे प्रभावशाली है। प्रदेश में कुल 2.88 करोड़ किसानों की डिजिटल आईडी बनाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा गया है, जिसके सापेक्ष उत्तर प्रदेश ने अब तक 72.2 प्रतिशत से अधिक की उपलब्धि हासिल कर ली है।

यह आंकड़ा न केवल संख्या की दृष्टि से बड़ा है, बल्कि यह इस बात का भी प्रमाण है कि, सरकारी योजनाओं का लाभ सीधे लाभार्थी तक पहुंचाने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार कितनी प्रतिबद्ध है। केंद्र सरकार ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि यूपी ने न केवल फार्मर आईडी बनाने में बाजी मारी है, बल्कि डिजिटल क्रॉप सर्वे के मामले में भी 91 प्रतिशत प्लॉटों को कवर कर एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है।

क्षेत्रीय कृषि सम्मेलन में जब अन्य राज्यों के प्रदर्शन की तुलना उत्तर प्रदेश से की गई, तो अंतर साफ नजर आया। डिजिटल कृषि के मोर्चे पर जहां उत्तर प्रदेश 75 प्रतिशत (पंजीकृत किसानों के अनुपात में) के करीब पहुंच रहा है, वहीं पड़ोसी और अन्य कृषि प्रधान राज्य अभी इस दौड़ में काफी पीछे हैं। उदाहरण के तौर पर हिमाचल प्रदेश ने जरूर 92 प्रतिशत क्रॉप सर्वे कर अपनी सक्रियता दिखाई है, लेकिन वहां अब तक केवल 56 प्रतिशत किसानों की ही फार्मर आईडी बन पाई है।

वहीं, आधुनिक खेती के लिए पहचाने जाने वाले हरियाणा में यह आंकड़ा महज 11 प्रतिशत और देवभूमि उत्तराखंड में केवल 17.9 प्रतिशत तक ही सीमित है। इन राज्यों की तुलना में उत्तर प्रदेश की यह छलांग इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यूपी की भौगोलिक विविधता और किसानों की विशाल संख्या के प्रबंधन को देखते हुए यह कार्य काफी चुनौतीपूर्ण था, जिसे प्रदेश सरकार ने सफलतापूर्वक अंजाम दिया है।

भारत सरकार के कृषि मंत्रालय ने अब इस डिजिटल अभियान के अगले चरण की रूपरेखा तैयार कर ली है। अपर सचिव प्रमोद कुमार ने सम्मेलन में यह निर्देश दिए कि अब उन जमीनों पर ध्यान केंद्रित किया जाए, जो वर्तमान में अनक्लेम्ड हैं यानी जिन पर किसी व्यक्ति या संस्था का सीधा दावा अब तक दर्ज नहीं हो सका है। अक्सर ऐसी जमीनें सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन और सही आंकड़ों के अभाव में विकास प्रक्रिया से बाहर रह जाती हैं।

केंद्र ने सभी राज्यों को सख्त लहजे में पत्र जारी कर यह आदेश दिया है कि, आगामी 20 मई तक ऐसी सभी जमीनों को भी फार्मर आईडी और डिजिटल रिकॉर्ड से जोड़ दिया जाए। इस प्रक्रिया का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि राज्य का एक-एक इंच कृषि योग्य भूखंड डिजिटल मानचित्र पर हो, ताकि भविष्य में फसल बीमा, खाद-बीज पर सब्सिडी और अन्य सरकारी सुविधाओं का वितरण करते समय किसी भी प्रकार की धोखाधड़ी या विसंगति की गुंजाइश न रहे।

इस मिशन को 20 मई तक पूरा करने के लिए केंद्र और राज्य सरकार ने एक ठोस प्रशासनिक ढांचा तैयार किया है। सभी राज्यों को निर्देशित किया गया है कि वे तत्काल प्रभाव से राज्य स्तर पर समर्पित नोडल अधिकारी नियुक्त करें जो केवल फार्मर आईडी और अनक्लेम्ड लैंड लिंकिंग की निगरानी करेंगे। वहीं, जिला स्तर पर इस पूरी जिम्मेदारी का केंद्र जिलाधिकारियों को बनाया गया है।

जिलाधिकारियों को यह जिम्मा सौंपा गया है कि, वे राजस्व विभाग और कृषि विभाग की टीमों के माध्यम से जमीनों का भौतिक सर्वे सुनिश्चित करें और यह देखें कि फार्मर आईडी बनाने की प्रक्रिया में कहीं कोई चूक तो नहीं हो रही है। अनक्लेम्ड प्लॉटों को लिंक करना न केवल रिकॉर्ड के शुद्धिकरण के लिए जरूरी है, बल्कि यह भविष्य में भूमि विवादों को कम करने और लैंड बैंक बनाने में भी मददगार साबित होगा।

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