लखनऊ। लिवर व पेट सम्बन्धी बीमारियां बढ़ रही हैं। बावजूद इसके सरकारी अस्पतालों में इसका इलाज ही नहीं है। ऐसी तकलीफ से गुजर रहे मरीजों को केजीएमयू, पीजीआई व अन्य बड़े संस्थानों में रेफर किया जा रहा है, जहां पहले से ही लोड अधिक है। दरअसल डॉक्टरों की कमी से जूझ रहे सरकारी अस्पतालों में विशेषज्ञ ही नहीं है, जिस कारण कई विभाग संचालित ही नहीं हो पा रहे हैं।
प्रदेश में 19 हजार डॉक्टरों के पद स्वीकृत हैं जिसमें आधे से ज्यादा खाली पड़े हैं। महज 12 हजार डॉक्टर तैनात हैं, इनमें भी कई गैरहाजिर बताये जा रहे हैं। इनमें भी कोई विशेषज्ञ नहीं हैं। स्थिति यह है कि कोई गैस्ट्रो विशेषज्ञ न होने से पेट के जुड़ी गम्भीर बीमारियों का इलाज नहीं हो पा रहा है। यहां इलाज के लिए आने वाले मरीजों को केजीएमयू, पीजीआई व अन्य संस्थान रेफर किया जाता है, जहां भीड़ अधिक होने के कारण इलाज मिलना आसान नहीं होता। ऐसे में कई मरीजों को निजी अस्पतालों में महंगा इलाज कराना पड़ता है। स्वास्थ्य विभाग से जुड़े जानकार बताते हैं कि प्रदेश को इस समय लगभग 33 हजार से ज्यादा विशेषज्ञ डॉक्टर चाहिए और लगभग छह हजार से ज्यादा एमबीबीएस की जरूरत है।
वर्ष 2020 के बाद पद बढ़ाने की कोई चर्चा भी नहीं हुई है, जो डॉक्टर उपलब्ध हैं, उन पर भांति-भांति के प्रतिबंध हैं। आज कोई भी सरकारी डॉक्टर वीआरएस नहीं ले सकता। पहले डॉक्टर के रिटायरमेंट की उम्र 58 थी, फिर 60 हुई और अब तो कई डॉक्टर 65 की उम्र में भी काम कराया जायेगा। प्रान्तीय चिकित्सा सेवा संघ के अध्यक्ष सचिन वैश्य का कहना है कि कोई भी सरकारी डॉक्टर तीन लाख रुपये महीने से ज्यादा वेतन-भत्ते के रूप में नहीं पाता. नतीजतन, पीएमएस में आने को चिकित्सकों में कोई उत्साह नहीं है। डॉक्टर पोस्टमार्टम और वीआईपी एम्बुलेंस ड्यूटी कर रहे हैं। इन तमाम दिक्कतों को देखते हुए कोई भी नया चिकित्सक सरकारी सेवा में आना ही नहीं चाहता।
उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग ने डॉक्टर के 401 पदों के लिए वैकेंसी निकाली, सिर्फ 40 पद भरे जा सके। बाकी सब खाली रह गये। डॉक्टरों की इस कमी से जूझ रही राज्य सरकार ने ठेके पर डॉक्टर भर्ती करने का फैसला लिया और पांच लाख रुपये महीने की अधिकतम सैलरी तय की। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत 1200 विशेषज्ञ डॉक्टर्स की वैकेंसी निकाली। बमुश्किल सौ डॉक्टर इस मुहिम के माध्यम से तैनात किए जा सके।





