यह कहानी है मानवता को बचाने के मिशन पर निकले एक अकेले अंतरिक्ष यात्री की
लखनऊ। रयान गोसलिंग स्टारर ‘प्रोजेक्ट हेल मैरी’ अमेरिका सहित दुनिया के बाकी देशों में रिलीज के एक हफ्ते बाद भारतीय सिनेमाघरों में आ गई है। पहले यह साइंस-फिक्शन एडवेंचर फिल्म 20 मार्च को ही भारत में भी रिलीज होने वाली थी। लेकिन ‘धुरंधर 2’ के क्रेज को देखते हुए मेकर्स ने इसे पोस्टपोन कर दिया। यह फिल्म पहले ही विदेशों में खूब तारीफ बटोर रही है। डायरेक्टर जोड़ी फिल लॉर्ड और क्रिस्टोफर मिलर, मानवता को बचाने के मिशन पर निकले एक अकेले अंतरक्षि यात्री की कहानी लाए हैं, जो पहले ही सीन से रोमांच जगाती है। मानना होगा कि वे जबरदस्त विजुअल्स के साथ विज्ञान की प्रक्रियाओं और भावनाओं से जोड़ने में सफल रहे हैं। फिल्म शुरू से आखरि तक आपमें जोश बनाए रखती है। यह कहानी है मानवता को बचाने के मिशन पर निकले एक अकेले अंतरिक्ष यात्री की। यह एंडी वियर की साइंस-फक्शिन बेस्टसेलर किताब ‘द 2021 नॉवल’ पर आधारित है। डॉ. रायलैंड ग्रेस (रयान गोसलिंग) एक स्पेसक्राफ्ट पर अपने इंड्यूस्ड कोमा से अचानक जागता है। अजीब बिखरे बाल, बढ़ी हुई दाढ़ी में डॉ. रायलैंड जागते तो हैं, लेकिन उनकी याददाश्त जा चुकी है। उसे बिल्कुल याद नहीं है कि वह यहां क्यों आया है। स्पेसक्राफ्ट के बाकी सभी क्रू मेंबर मर चुके हैं। डॉ. रायलैंड को धीरे-धीरे याद आता है कि वह एक हाई स्कूल का साइंस टीचर और पूर्व मॉलिक्यूलर बायोलॉजिस्ट है। लेकिन अब उसे यह पता लगाना है कि वह यहां कैसे पहुंचा, क्यों पहुंचा है और आखरि इंसानियत को बचाने के इस मिशन को वह अकेले कैसे पूरा करेगा? फिल लॉर्ड और क्रिस्टोफर मिलर की सबसे अच्छी बात यह रही है कि उन्होंने ‘प्रोजेक्ट हेल मैरी’ की सबसे बड़ी जरूरत को समझा है। उन्होंने इसमें समस्या और उसके समाधान को कंटेंट फोकस ड्रामा बनाकर पर्दे पर उतारा है। ऐसी फिल्मों में आम तौर पर एक्शन सीन्स पर निर्भर रहने के बजाय, उन्होंने फिल्म में क्रमिक खोजों के जरिए तनाव पैदा करने का काम किया है। इस तरह, कहानी में हर वैज्ञानिक चुनौती अपने आप में एक महत्वपूर्ण किस्सा बन जाता है। डॉ. रायलैंड ग्रेस (रयान गोसलिंग) को समस्याओं से जूझते, हायपोथेससि का परीक्षण करते, असफल होते और फिर से प्रयास करते देखना, फिल्म को एक लय में बांधता है। यह सब दर्शक के दिमाग में एक आकर्षण पैदा करता है, लेकिन इसे उबाऊ नहीं होने देता।रयान गोसलिंग की एक्टंिग में बेहतरीन और जरूरी बैलेंस है। वह अपने किरदार को अचूक प्रतिभा वाला दिखाने से बचते हैं, बल्क िउसे अनिश्चितता, डर और आगे आने वाले हालात के हिसाब से ढलने पर जोर देते हैं। इस तरह उनका चरित्र अधिक सुलभ बन जाता है। खास तौर पर जब फिल्म में उनकी खोई-खोई सी याद्दाश्त समय के साथ होने वाली खोजों के जरिए वापस आती जाती है। फ्लैशबैक का इस्तेमाल भी सटीकता के साथ किया गया है। यह फिल्म जो एक किरदार से शुरू हुई थी, धीरे-धीरे वैश्वकि समस्या और डॉ रायलैंड की निजी अनिच्छा को उजागर करती है। इससे कहानी में गहराई आती है। विजुअल्स की बात करें, तो पर्दे पर अंतरिक्ष की दुनिया को देखने का अनुभव शानदार है। लेकिन यहां भी फिल्म को ग्रैंड विजुअल्स में उलझाने की बजाय इसके लयबद्ध पटकथा को प्राथमिकता दी गई है। वैज्ञानिक प्रक्रियाओं पर जोर दिया गया है। यहां तक कि अधिक काल्पनिक चीजों को भी इस तरह से दिखाया गया है कि दर्शकों की समझ में कोई उलझन ना हो। यह धैर्य दर्शकों को पर्दे पर दिखाए जा रहे तर्क से जोड़े रखता है।
हालांकि, फिल्म का इमोशनल पंच एक सबसे अजीब और अनूठे रिश्ते से जुड़ा है। बिना कोई स्पॉयलर दिए, यहां बस इतना कहना सही होगा कि पर्दे पर दो किरदारों के बीच का यह संबंध अपनी डिटेलिंग की वजह से गहरा और गर्मजोशी से भरा हुआ है। फिल्ममेकर्स ने इस रिश्ते को आगे बढ़ाने में कोई जल्दबाजी नहीं दिखाई है। एक-दूसरे से बात नहीं कर पाने की बाधाओं और समस्या के समाधान को ही रिश्ते की नींव के रूप में उपयोग किया गया है। यह सब इस फिल्म को एक नई ऊंचाई देता है।
कलाकार :रयान गोसलिंग,सैंड्रा हुलर,मिलाना वेनट्रब,जेम्स
डायरेक्टर :फिल लॉर्ड,क्रिस्टोफर मिलर
रेटिंग-4/5





