15 दिवसीय संस्कृत प्रशिक्षण नाट्य कार्यशाला का समापन
लखनऊ। उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान और रंगनाद के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित 15 दिवसीय संस्कृत प्रशिक्षण नाट्य कार्यशाला का समापन मुंशी प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी सुभागी पर आधारित संस्कृत नाट्य प्रस्तुति के साथ हुआ। यह कार्यशाला मंगला देवी हाईस्कूल में आयोजित की गई, जबकि नाटक का मंचन माध्यमिक विद्यालय इंटर कॉलेज, तोपखाना प्रेक्षागृह में किया गया। इस प्रस्तुति की परिकल्पना व निर्देशन देवाशीष मिश्र द्वारा की गई, जबकि कार्यशाला का निर्देशन रोजी मिश्रा ने किया। नाटक के संस्कृत संभाषण प्रखर द्विवेदी ने तैयार किए, जिसने प्रस्तुति को विशेष रूप से प्रभावी बनाया।
कार्यशाला के दौरान प्रतिभागियों को अभिनय, संस्कृत संवाद, नृत्य, संगीत और मंच अनुशासन का प्रशिक्षण के साथ ही नाट्य शास्त्र पर आख्यान दिया गया। समापन प्रस्तुति के रूप में मंचित नाटक सुभागी में बाल-विवाह, विधवा-जीवन और स्त्री के आत्मसम्मान जैसे सामाजिक विषयों को संवेदनशील और प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया गया।
नाटक में सूत्रधार की भूमिकाओं में सबा, जाफरीन, अंजलि, नसरा, रितेश, अनिरुद्ध चौधरी, धैर्ययांश विश्वकर्मा, अशद, अश्वत, महर्षि, आराध्या और सामया ने कथा को क्रमबद्ध रूप से आगे बढ़ाया। छोटी सुभागी की भूमिका में शीतल और युवा सुभागी के रूप में ऋचा ने सशक्त अभिनय से दर्शकों को प्रभावित किया। तुलसी महतो के रूप में अंकित मिश्रा, लक्ष्मी के रूप में भूमिका गुप्ता, सज्जन सिंह के रूप में योगेन्द्र पाल, रामू के रूप में अंकित कुमार तथा रामू की पत्नी के रूप में मानवी ने अपने पात्रों को सजीव बनाया। ग्रामवासियों की भूमिकाओं में शालिनी, आरती, संतोषी, मुन्ना रावत, अंकित, पूर्वी, प्रियांशु कश्यप, कांक्षा, वैष्णवी, शिखा और अंकित ने ग्रामीण वातावरण को प्रभावी रूप से प्रस्तुत किया।
प्रस्तुति में कोरस के रूप में सारिका, राधिका, इंशा, नैंसी, वैष्णवी, शिखा, काजल, अर्चना, इनाया, काम्या, दिशु, सुगरा, शगुफ्ता, समयरा, इकरा, सुबुही, अनन्या, आकांक्षा, प्रियांशी और अन्वेषा ने समूह प्रस्तुति के माध्यम से नाटक को और भी जीवंत बनाया। मंच के पीछे भी कई लोगों का महत्वपूर्ण योगदान रहा। मंच सज्जा आकाश दयाल ने की, मंच सामग्री की जिम्मेदारी भावना गुप्ता ने निभाई। वेशभूषा शिल्पी दुबे द्वारा तैयार की गई। नृत्य निर्देशन प्रखर मिश्रा तथा संगीत संयोजन व संचालन आद्या मिश्रा ने किया।
इस नाट्य प्रस्तुति ने न केवल प्रेमचंद की मार्मिक कहानी को मंच पर जीवंत किया, बल्कि संस्कृत भाषा के प्रयोग के साथ नई पीढ़ी को भारतीय रंगमंचीय परंपरा से जोड़ने का एक सफल प्रयास भी सिद्ध हुई।





