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सांसारिक व सामाजिक मूल्यों से युक्त है ‘सीता वनवास’

राय उमानाथ बली प्रेक्षागृह में नाटक का मंचन
लखनऊ। सीता वनवास’ नाटक अनेक रामायणों के ‘लव कुश’ संवाद में वर्णित सीता वनवास का कल्पित वर्णन है। आगा हशर कश्मीरी द्वारा लिखित का यह नाटक सिर्फ धार्मिक और श्रद्धारूपी ही नहीं बल्कि सांसारिक व सामाजिक मूल्यों से युक्त है। सूर्या थिएटर कल्चरल आर्ट्स सोसाइटी, लखनऊ द्वारा आयोजित नाटक ‘सीता वनवास’ के माध्यम से आधुनिक समाज के सामने रामराज्य के पति-पत्नि, राजा-प्राप्जा, कर्तव्य, राजनीति, गुरु-माता, शिक्षा व शिष्टाचार का श्रेष्ठ उदाहरण रखा है, जिसका मंचन संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के सहयोग से दिनांक : 24 फरवरी 2026 को राय उमानाथ बली प्रेक्षाग्रह, कैसरबाग, लखनऊ में किया गया है। निर्देशन कर रहे विवेक मिश्रा और कलाकारों ने बहुत ही प्रभावशाली और मार्मिक प्रस्तुति दी।
लंका विजय के बाद अयोध्या लौटकर श्री राम राजा बनते हैं। एक बार एक धोबी अपनी पत्नी को (जो कुछ दिन दूसरे के घर रुक कर आई थी) घर में रखने से मना कर देता है और राजा राम का उदाहरण देता है कि राम ने तो रावण के घर रही सीता को अपना लिया, लेकिन मैं नहीं अपनाऊंगा। यह बात जब श्री राम तक पहुँचती है, तो वे राजा के रूप में धर्मसंकट में पड़ जाते हैं। प्रजा को आदर्श शासन का उदाहरण देने के लिए, राम अत्यंत दुखी मन से सीता जी के परित्याग का निर्णय लेते हैं।
सीता अपनी पवित्रता सिद्ध करने के लिए माता धरती (पृथ्वी) से अपनी गोद में ले लेने की प्रार्थना करती हैं। सीता धरती में समा जाती हैं, जिससे यह नाटक अत्यंत मार्मिक अंत के साथ समाप्त होता है। मुख्य भूमिकाओं में राजा राम: आदर्श तिवारी, रानी सीता : मुस्कान सोनी, लक्ष्मण: किशन वर्मा, वशिष्ठ: राहुल मिश्रा, सखी : रमा जायसवाल / प्रीयम, रजकी : एकता सिंह रहे। नाटक को सफल बनाने में मुख-सज्जा: सचिन-शहीर, वेशभूषा: सूर्या-मुन्नी-रुचिका, संगीत: हिमांशु, मंच सज्जा: ज्ञानवती – उषा, प्रकाश: तमाल बोस और प्रेक्षागृह व्यवस्था: सुशीला-रमा का योगदान सराहनीय रहा ।

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