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लोक व्यवहार और नैतिक मूल्य ही सनातन संस्कृति का मूल भाव

हिंदू सम्मेलन एवं समरसता भोज का आयोजन संपन्न

लखनऊ। आज हिंदू सम्मेलन एवं समरसता भोज का आयोजन रामाधीन सिंह उत्सव स्थल, लाल आईटी चौराहा के निकट किया गया। कार्यक्रम का आयोजन सकल हिंदू समाज, रामदीन बस्ती, विवेकानंद, लखनऊ उत्तर विभाग द्वारा किया गया।
कार्यक्रम में बड़ी संख्या में समाज के विभिन्न वर्गों के लोग उपस्थित रहे। सम्मेलन का उद्देश्य सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक चेतना तथा सनातन मूल्यों के प्रति जागरूकता को सुदृढ़ करना रहा।
कार्यक्रम की पद्मश्री विद्याबिन्दु ने अपने उद्बोधन में कहा कि लोक व्यवहार और नैतिक मूल्य ही सनातन संस्कृति का मूल भाव हैं। उन्होंने कहा कि सनातन परंपरा में संस्कारों के माध्यम से व्यक्ति और समाज दोनों का उत्थान होता है। उन्होंने लक्ष्मण-सीता-राम के वनगमन, कौशल्या माता के आशीर्वाद तथा संस्कार आधारित जीवन दृष्टि के उदाहरणों के माध्यम से सनातन संस्कृति की गहराई को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि जागरण और सामूहिक आयोजनों से समाज में अन्याय के प्रतिकार की शक्ति का संचार होता है।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता अवध प्रांत के प्रांत प्रचारक कौशल जी ने अपने संबोधन में कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के अवसर पर संघ द्वारा सात प्रकार के कार्यक्रमों का निश्चय किया गया है, जिनमें बस्ती स्तर पर हिंदू सम्मेलन हो रहें हैं। उन्होंने बताया कि शताब्दी वर्ष के अंतर्गत संघ ने विश्व का सबसे बड़ा गृह संपर्क अभियान संचालित किया है, जिसके माध्यम से अब तक पूरे भारत में लगभग 48 लाख परिवारों तक संपर्क स्थापित किया जा चुका है।
कौशल ने कहा कि केवल अवध प्रांत में ही लगभग 3000 हिंदू सम्मेलन आयोजित किए जाने की योजना है। शताब्दी वर्ष के सभी कार्यक्रम समाज के सहयोग से बस्ती स्तर पर संपन्न किए जा रहे हैं, जिसके लिए समाज से ही पाँच विषय तय किए गए हैं। पंच परिवर्तन के ये विषय हैं— स्व-बोध एवं कुटुंब प्रबोधन, सामाजिक समरसता, नागरिक कर्तव्य और पर्यावरण संरक्षण।
उन्होंने कहा कि हिंदू समाज की आत्म-चेतना को जाग्रत करने का कार्य राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पिछले 100 वर्षों से निरंतर करता आ रहा है। भारत एक हिंदू राष्ट्र है—इस संकल्प के साथ संघ अपने संकल्प पथ पर सतत अग्रसर है। डॉ. हेडगेवार के विचारों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि शक्ति ही समाज का आधार है और यह शक्ति हिंदू धर्म में संगठित समाज के रूप में निहित है। सनातन संस्कृति का कोई एक संस्थापक नहीं है और इसके चिंतन में संपूर्ण विश्व के कल्याण की भावना अंतर्निहित है। यह संस्कृति सभी को साथ लेकर चलने वाली जीवन दृष्टि में विश्वास रखती है, इसी कारण ह्लसर्वे भवन्तु सुखिन:, सर्वे सन्तु निरामया:ह्व जैसे विचार इसके मूल में हैं, जिनमें प्राणियों के प्रति सद्भावना और विश्व-कल्याण की भावना निहित है।
उन्होंने कहा कि जिस संस्कृति के मूल में कण-कण में ईश्वर का भाव हो, वहाँ समाज में समरसता स्वाभाविक रूप से विकसित होती है। अंत में उन्होंने आह्वान किया कि हिंदू समाज अपनी चेतना को सही दिशा में जाग्रत करे और राष्ट्र निर्माण के कार्य में सक्रिय रूप से सहभागिता निभाए।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि पूज्य महाराज रितेश्वर महाराज ने अपने प्रेरक उद्बोधन में कहा कि हिंदू सम्मेलन समाज को चेतना के उच्च स्तर तक ले जाने का माध्यम है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में समाज के सामने दो प्रकार के लोग है एक वे लोग, जिन्हें अपनी संस्कृति पर मंडराते संकट का भान नहीं है, और दूसरे वे, जो केवल व्हाट्सएप एवं सोशल मीडिया के माध्यम से स्वयं को ज्ञानी मानते हैं, किंतु कर्म के स्तर पर सक्रिय नहीं हैं।
उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज की युवा पीढ़ी अंग्रेजी मानसिकता के जंगल में उलझती जा रही है, जिसके कारण उनके भीतर स्वत्व-बोध का क्षय हो रहा है। उन्होंने कहा कि यह समझना आवश्यक है कि अतीत में भारत के विखंडन क्यों हुए और उनसे क्या सबक लिया जाना चाहिए। इसके लिए चेतन बोध अत्यंत आवश्यक है।
पूज्य महाराज ने कहा कि इस पृथ्वी पर केवल एक ही धर्म है, जिसे हम सब हिंदू धर्म के रूप में स्वीकार करते हैं, जबकि अन्य मत, पंथ विचारधाराएँ हैं। हिंदू धर्म का दर्शन कहीं से भी संकीर्ण नहीं है, बल्कि वह संपूर्ण विश्व के कल्याण की भावना से प्रेरित है। उन्होंने वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दृष्टि से यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी व्यक्ति में जन्म से लेकर सात वर्ष की आयु तक ही संस्कारों का सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है, इसलिए माता-पिता का यह कर्तव्य है कि वे अपने पुत्र-पुत्रियों को संस्कारित करें और उनमें हिंदू चेतना का बोध कराएँ।
उन्होंने स्पष्ट किया कि यह हिंदू सम्मेलन किसी एक संगठन का नहीं, बल्कि सामान्य हिंदू समाज का कार्यक्रम है। हिंदू होना केवल गर्व का विषय नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी भी है। भारत तभी सुरक्षित रह सकता है, जब संस्कृति और संस्कारों की निरंतर धारा प्रवाहित होती रहे।
समरसता पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि जो भी भारत माता और उसकी संस्कृति का सम्मान करता है, वही उनका सहोदर भाई है, चाहे व्यक्तिगत संबंध कैसे भी हों। समरसता एक व्यापक विषय है और इसका भाव समाज के प्रत्येक हिंदू में प्रवाहित होना चाहिए।
पूज्य महाराज ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संदर्भ में कहा कि सौ दिन तक भी किसी संकल्प पर टिके रहना कठिन होता है, जबकि संघ पिछले सौ वर्षों से संकल्प पथ पर निरंतर अग्रसर है। अनेक अभावों के बावजूद स्वयंसेवकों ने समाज संगठन का कार्य नहीं छोड़ा। इसी दीर्घकालिक साधना के परिणामस्वरूप आज हिंदू सम्मेलन जैसे आयोजन संभव हो पाए हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि समाज के मानस में हिंदुत्व के पथ पर चलने वालों को हीन दृष्टि से देखने की जो प्रवृत्ति विकसित हुई, उसका वैचारिक प्रतिकार संघ ने किया है तथा हिंदू शब्द के प्रति फैलाई गई संकीर्णता को दूर करने का कार्य किया है।
अपने उद्बोधन में उन्होंने कहा कि हिंदू संस्कृति मानव और प्रकृति के समन्वय की संस्कृति है। मनुष्य जन्म से पशुता भाव लेकर आता है, किंतु संस्कारों के माध्यम से वह मनुष्यता और अंतत: देवत्व की ओर अग्रसर होता है। उन्होंने संघ को बलिदान का संगठन बताते हुए स्वयंसेवकों को चलते-फिरते संत की संज्ञा दी
अंत में उन्होंने कहा कि सीताराम, जय श्रीराम और जय सियाराम सब एक ही भाव के प्रतीक हैं। उन्होंने आह्वान किया कि समाज अपने हृदय से हीनता का भाव त्यागे, चेतना का बोध प्राप्त करे और अपनी पुरातन संस्कृति, राष्ट्रकथा तथा भारत के स्वर्णिम इतिहास को समझकर उसे वर्तमान में पुनर्स्थापित करने का प्रयास करे। जाति पहचान का माध्यम हो सकती है, किंतु भेदभाव का आधार नहीं। हिंदुत्व से ही मानवता, समाज और विश्व-कल्याण की प्रक्रिया संभव है। कार्यक्रम में अनिल, धनश्याम दास अग्रवाल,सचिन गुप्ता, वीर बहादुर, अनुराग साहू, रमन निगम, संदीप वर्मा, संचालन सफलता पूर्वक डॉ. अमित कुमार कुशवाहा ने किया।

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