वाराणसी। सावन माह के पहले सोमवार को काशी नगरी में आस्था और भक्ति की अद्भुत तस्वीर देखने को मिली, जब यादव समाज के 50,000 से अधिक शिवभक्तों ने एकजुट होकर बाबा काशी विश्वनाथ का सबसे पहले जलाभिषेक किया। यह दृश्य न केवल भक्ति का प्रतीक था, बल्कि सनातन परंपरा और श्रद्धा की शक्ति का भी जीवंत प्रमाण बना।
गंगाजल से भरी कांवड़, “हर हर महादेव” के गूंजते जयघोष और शिवभक्ति में लीन काशी की हवाओं ने इस अवसर को अविस्मरणीय बना दिया। यादव समाज के शिवभक्तों का यह संगठित और भावनात्मक प्रयास श्रद्धालुओं के बीच चर्चा का विषय बन गया।
यादव समाज को भगवान श्रीकृष्ण का वंशज माना जाता है, और पुराणों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण स्वयं भगवान शिव के परम उपासक थे। मान्यता है कि श्रीकृष्ण ने काशी में स्वयं बाबा विश्वनाथ की पूजा-अर्चना की थी। इसी ऐतिहासिक और धार्मिक जुड़ाव के चलते यादव समाज का बाबा विश्वनाथ के प्रति गहरा भावनात्मक नाता बन गया है।

सामूहिक जलाभिषेक की इस परंपरा को समाज के लोगों ने ‘धार्मिक अधिकार’ के रूप में नहीं, बल्कि अपनी पीढ़ियों की आस्था और भक्ति की निरंतरता के रूप में देखा। श्रद्धालुओं का कहना है कि यह कोई प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति के प्रति समर्पण का भाव है।
बता दें, कि जलाभिषेक की ये परंपरा 1932 से शुरू की गई। बताया जाता है कि उस साल पूरे देश में जबरदस्त सूखा और अकाल पड़ा। उस वक्त किसी महात्मा ने उपाय सुझाया। उन्होंने कहा कि काशी में बाबा विश्वनाथ और अन्य शिवालयों में यादव समुदाय की तरफ से जलाभिषेक किया जाए तो सूखे से छुटकारा मिल सकता है तभी से ये परंपरा शुरू हो गई।

इतनी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के आगमन को देखते हुए वाराणसी प्रशासन ने सुरक्षा के कड़े इंतज़ाम किए थे। पुलिस, स्वास्थ्य सेवाओं और स्वयंसेवकों की तैनाती ने यह सुनिश्चित किया कि यह आयोजन शांतिपूर्ण और व्यवस्थित रूप से संपन्न हो।





