महीने के कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि पर रखा जाता है
लखनऊ। भगवान शिव की साधना-आराधना के लिए प्रदोष व्रत अत्यंत शुभ माना जाता है। मान्यता है कि, इस दिन की पूजा-अर्चना से महादेव शीघ्र ही प्रसन्न होकर अपनी कृपा बरसाते हैं। पंचांग के मुताबिक, यह उपवास हर महीने के कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि पर रखा जाता है। इस तिथि पर प्रदोष काल में पूजा का विधान है। कहते हैं कि, प्रदोष काल में शंकर जी देवी पार्वती संग नंदी पर सवार होकर कैलाश पर नृत्य करते हैं। इस अवधि में शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाने से बड़ी से बड़ी समस्याएं समाप्त हो सकती हैं। यही नहीं वैवाहिक जीवन भी मधुरमय बनता है। इस बार फाल्गुन शुक्ल त्रयोदशी तिथि का प्रारंभ 28 फरवरी को रात 8 बजकर 43 मिनट पर हो रहा है। इस तिथि का समापन 1 मार्च रविवार को शाम 7 बजकर 9 मिनट पर है। प्रदोष काल के मुताबिक, 1 मार्च को प्रदोष व्रत रखा जाएगा। इस दिन रविवार होने के कारण यह रवि प्रदोष कहलाया जाएगा।
पूजा मुहूर्त
प्रदोष व्रत के दिन पूजा के लिए सर्वश्रेष्ठ समय शाम 6 बजकर 21 मिनट से लेकर शाम 7 बजकर 09 मिनट तक माना जा रहा है। इस दौरान महादेव की उपासना करने से व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। इसके अलावा रवि प्रदोष व्रत पर रवि पुष्य योग, सर्वार्थ सिद्धि योग और पुष्य नक्षत्र का साया बना रहेगा।
रवि प्रदोष व्रत का महत्व
रविवार के दिन पड़ने वाले प्रदोष व्रत को रवि प्रदोष व्रत के नाम से जानते हैं। यह तिथि भगवान शिव को समर्पित होती है। इस दिन भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए विधि-विधान से पूजा-अराधना की जाती है। प्रदोष व्रत रखने से भगवान शिव अपने भक्तों के सारे दुख-कष्ट दूर करते हैं। मान्यता है कि प्रदोष काल में भगवान शंकर कैलाश पर्वत पर नृत्य करते हैं और देवतागण उनके गुणगान करते हैं। मान्यता है कि प्रदोष व्रत रखने से भगवान शिव अपने भक्त के सभी दुख दूर करते हैं। प्रदोष व्रत में प्रदोष काल में पूजा का विशेष महत्व होता है।
पूजा विधि
प्रदोष व्रत के दिन प्रदोष काल में एक साफ चौकी पर भगवान शिव की मूर्ति या शिवलिंग स्थापित करें। शिवलिंग पर जल, दूध, दही, शहद, घी और शक्कर के मिश्रण से अभिषेक करें। फिर साफ पानी में गंगाजल लेकर शिवलिंग पर जला भी चढ़ाएं। आप 11 या 21 बेलपत्र लेकर ऊँ नम: शिवाय। का जाप करें और प्रभु को यह चढाएं। अब गेहूं, दाल, फूल माला, भांग-धतूरा भी अर्पित कर दें। इस दौरान भोलेनाथ को चंदन अवश्य लगाएं और घी से प्रभु के समक्ष दीपक जलाएं। ॐ पार्वतीपतये नम:। और नमो नीलकण्ठाय। का स्मरण करें।
प्रदोष व्रत की कथा सुनें और शिव परिवार की आरती कर लें।





