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जेएनयू में अशांति

वाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय को विशेष कर सामाजिक विज्ञान के अध्ययन के मामले में एक अच्छा अकादमिक संस्थान माना जाता है। लंबे समय तक यह शिक्षा संस्थान स्वस्थ सामाजिक, राजनीतिक विमर्श का केन्द्र भी रहा है। इसके परिसर में हालांकि एक विशेष विचारधारा के छात्रों का प्रभाव है, लेकिन फिर भी सभी विचारधारा के छात्रों को अध्ययन और विमर्श का बेहतर मौका मिलता है। लेकिन वर्ष 2014 के आम चुनाव में पूर्ण बहुमत से भारतीय जनता पार्टी के सत्ता में आने के बाद से जिस तरह इस शिक्षा संस्थान में लगातार अशांति व्याप्त है, वह अत्यंत चिंताजनक है।

कभी कुलपति की नियुक्ति का विरोध, कभी कश्मीर दिवस मनाना, आतंकियों का महिमा मंडन, देश विरोधी नारे लगना, यह सारी घटनाएं इस विश्व विद्यालय के परिसर में लगातार होती रही हैं। फिलहाल वर्तमान हिंसा का मुख्य कारण जेएनयू की फीस वृद्धि है। दरअसल सरकारों से आर्थिक मदद के मामले में जेएनयू को एक लंबे समय तक विशेष ट्रीटमेंट मिलता रहा है। अधिक मदद मिलने के कारण यहां छात्रों को बेहतरीन शिक्षा, शैक्षिक ढांचा, लैब, लाइबे्ररी, छात्रवृत्ति, हॉस्टल, मेस जैसी सुविधाएं बहुत ही मामूली कीमत पर मिलती रहीं, लेकिन अब जेएनयू प्रशासन को अपने खर्च के लिए छात्रों की फीसद बढ़ानी पड़ी है, जिसके कारण छात्र महीनों से आंदोलन कर रहे हैं।

आंदोलन करना छात्रों का अधिकार है बशर्ते वह नियम-कानून के दायरे में हो। फीसद वृद्धि का विरोध कर रहे छात्रों ने नये रजिस्टेÑशन प्रक्रिया को रोकने की कोशिश की जिसके बाद यह हिंसा हुई। जेएनयू परिसर में हिंसा के लिए चाहे जो भी जिम्मेदार हो उसको कानून के मुताबिक दण्ड मिलना चाहिए, क्योंकि शिक्षा परिसरों में गुंडागर्दी की इजाजत किसी को नहीं है। जहां तक परिसर में हुई हिंसा के बहाने सरकार को कटघरे में खड़ा करने की बात है, तो ऐसी ही कोशिशों के कारण जेएनयू परिसर लगातार गैर-शैक्षणिक गतिविधियों का अड्डा बना हुआ है। एक विश्व विद्यालय के परिसर में पठन-पाठन का माहौल होना चाहिए लेकिन लगातार जेएनयू परिसर गलत कारणों से चर्चा में है। जहां तक जेएनयू परिसर में छात्रों की एक खास विचारधारा के प्रति झुकाव की बात है, तो यह उनका अधिकार है।

छात्र किसी भी पार्टी या विचारधारा के हो सकते हैं, फीस वृद्धि का विरोध करना भी उनका अधिकार है, लेकिन ऐसा ही अधिकार सभी छात्रों को है। अगर कोई छात्र फीस वृद्धि का विरोध नहीं करता है, तो वह उसका अधिकार है। विश्वविद्यालय परिसर में छात्र अच्छी पढ़ाई करें, स्वस्थ संवाद करें और अनुसंधान में विश्वविद्यालय का नाम रौशन करें, अपना अच्छा कॅरियर बनायें, इसीलिए तो विश्वविद्यालय परिसर बनाये गये हैं और देश की जनता की गाढ़ी कमाई से संचालित हो रहे हैं। इसमें सरकार को भी अधिक समझदारी दिखानी चाहिए और यहां के छात्रों को भी यह समझना चाहिए कि सरकार उनकी शर्तों पर चले ऐसा जरूरी नहीं है। सरकार को करोड़ों मतदाताओं ने चुना है और वह अपने फैसले लेने के लिए स्वतंत्र है।

जिस फैसले से छात्रों की असहमति हो उसका विरोध एक सीमित दायरे में होना चाहिए। क्योंकि जेएनयू विश्व विद्यालय है और इसे विश्वविद्यालय ही रहने देना चाहिए। यह संसद भवन या राजनीतिक अखाड़ा नहीं है कि सरकार के हर फैसले का छात्र विरोध करें और समर्थन में पार्टियों के प्रतिनिधि जमावड़ा शुरू कर दें। दरअसल जेएनयू संकट का सबसे बड़ा कारण जरूरत से ज्यादा राजनीतिक गतिविधियां ही हैं।

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