‘गांधी टॉक्स’ इस बार एक ऐसा अनोखा सिनेमाई अनुभव जरूर दे जाती है
लखनऊ। बिना डायलॉग्स के स्टोरी टेलिंग काफी चुनौतीपूर्ण होती है। खासकर आजकल के दौर में, जहां 90 सेकेंड्स की रील का ट्रेंड है और हमारा अटेंशन स्पैन कम होता जा रहा है। हालांकि, ऐसे समय में साइलेंट फिल्म किसी भी कसौटी से कम साबित नहीं होती। कुछ अरसा पहले फिल्मकारों ने ‘क्रेजी’ और ‘उफ्फ ये स्यापा’ के जरिए मूक फिल्मे बनाने का चैलेंज लिया था, मगर दर्शकों ने उसे खास तवज्जो नहीं दी, लेकिन निर्देशक किशोर पांडुरंग बेलकर की ‘गांधी टॉक्स’ इस बार एक ऐसा अनोखा सिनेमाई अनुभव जरूर दे जाती है, जो खामोशी के जरिए ईमानदारी, उम्मीद और इंसानियत की बात करती है। यह कहानी है चॉल में रहने वाले महादेव (विजय सेतुपति) की, जो बीमार मां, गरीबी और बेरोजगारी के बीच पिस रहा है। बीए पास होने के बावजूद जब वह नौकरी की तलाश में बीएमसी पहुंचता है तो उसे समझ आता है कि बिना रिश्वत यहां कुछ संभव नहीं। रोटी, कपड़ा और मकान की जद्दोजहद से भरी उसकी जिंदगी में थोड़ी राहत है सामने वाले घर में रहने वाली गायत्री (अदिति राव हैदरी) का साथ। लेकिन उनके प्यार के रास्ते में भी सबसे बड़ा रोड़ा महादेव की बेरोजगारी ही है। दूसरी ओर, एक समानांतर दुनिया है अमीर उद्योगपति बोसमैन (अरविंद स्वामी) की, जिसने प्लेन क्रैश में अपना परिवार खो दिया और अब कारोबार में भी बबार्दी झेल रहा है। किस्मत इन दो बिल्कुल अलग लोगों को आमने-सामने ला खड़ा करती है। टूट चुका महादेव, बोसमैन को देखकर एक खतरनाक फैसला करने की सोचता है, जो उसकी सारी समस्याएं खत्म कर सकता है। लेकिन वह नहीं जानता कि बोसमैन भी अपनी जिंदगी की बाजी पलटने के लिए एक बड़ा दांव चलने वाला है। भारतीय सिनेमा की शुरूआत मूक फिल्मों से हुई थी। कमल हासन की ‘पुष्पक’ जैसे यादगार उदाहरण पहले से मौजूद हैं। ऐसे में डायरेक्टर किशोर पांडुरंग बेलकर के फिल्म ‘गांधी टॉक्स’ दिलचस्पी लिए हुए है। फिल्म की शुरूआत अपने अनोखे अंदाज में होती है, जहां मुंबई की चॉल पर फिल्माया गया दृश्य माहौल को सेट कर देता है। शुरू में बिना डायलॉग के फिल्म देखना थोड़ा अटपटा लगता है, मगर जल्द ही निर्देशक पर्दे के सामने बैठे दर्शकों को अपनी खामोशी की दुनिया का हिस्सा बना लेते हैं। बेलकर की कहानी मूल रूप से आम आदमी की दुश्वारियों और उनसे तंग आकर गलत रास्ता अख्तियार करने के मूल विचार को लेकर आगे बढ़ती है। फिल्म में भ्रष्टाचार का मुद्दा भी है। भारतीय रुपये पर छपे गांधी जी की तस्वीर से सिम्बॉलिक रूप से दशार्या गया है कि बापू को नोट पर छापकर उन्हें सर्वोच्च स्थान पर तो बिठा दिया गया, मगर उनके आदर्शों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। महादेव-गायत्री का चॉल रोमांस, पैसे कमाने के लिए महादेव का कृष्ण बनना, खाली डिब्बे में डिब्बे वाले के धमकी भरे मैसेजेस जैसे दृश्य दिल में उतर जाते हैं। हालांकि इस मूक फिल्म में कुछ सीन्स ऐसे भी हैं, जिसमें निर्देशक को टेक्स्ट मैसेजेस और सांकेतिक भाषा का सहारा लेना पड़ा है, मगर कुल मिलाकर दर्शक की उत्सुकता बरकार रहती है। सेकंड हाफ में कहानी थोड़ी हिचकोले खाती है और एक डार्क कॉमिडी में तब्दील हो जाती है। बोसमैन के घर में लुका-छिपी का खेल कुछ ज्यादा लंबा मालूम होता है, मगर इस पड़ाव पर एआर रहमान का बैकग्राउंड स्कोर फिल्म में जान डाल देता है। ये कहना गलत नहीं होगा कि एआर रहमान का म्यूजिक इस मूक फिल्म की जुबान और जान बनने में सफल रही है। फिल्म का क्लाइमैक्स फीलगुड वाला है और राहत देने का काम करता है। करण बी रावत की सिनेमैटोग्राफी में मुंबई के चॉल कल्चर और महानगर को एक अलग रूप में देखने का मौका मिलता है।अपनी सहजता और एफर्टलेस परफॉर्मेंस के लिए पहजाने जाने वाले विजय सेतुपति यहां भी अपने सहज-सरल अभिनय से किरदार को यादगार बना ले जाते हैं। बिना डायलॉग वाली इस फिल्म में वे अपनी भाव-भंगिमाओं से खूब एंटरटेन करते हैं। बबार्दी की कगार पर पहुंच चुके डिपरेस्ड बिजनेसमैन बोसमैन के चरित्र को अरविंद स्वामी दमदार तरीके से निभाते हैं। अदिति राव हैदरी ने अपनी खूबसूरती के साथ फिल्म में अपनी अभिनय क्षमता का भी परिचय दिया है। सड़कछाप सनकी चोर-उचक्के के किरदार में सिद्धार्थ जाधव मजेदार लगे हैं। गोविंद नामदेव, उषा नाडकर्णी और जरीना वहाब जैसे कलाकारों ने भी अपनी छोटी -छोटी भूमिकाओं के साथ मनोरंजन जोड़ा है।
ऐक्टर:विजय सेतुपति,अरविंद स्वामी,अदिति राव हैदरी,गोविंद नामदेव,सिद्दार्थ जाधव
डायरेक्टर :किशोर पांडुरंग बेलकर
रेटिंग-3/5





