लखनऊ कला महाविद्यालय में घर की अवधारणा पर इंटरैक्टिव आर्ट इंस्टॉलेशन
लखनऊ। कला एवं शिल्प महाविद्यालय ललित कला संकाय लखनऊ विश्वविद्यालय लखनऊ अपने कला-शिक्षण और रचनात्मक प्रयोगों के लिए विशेष पहचान रखता है। यहाँ केवल कला-कौशल का प्रशिक्षण ही नहीं दिया जाता, बल्कि आम जनमानस को कला से जोड़ने और संवेदनशील संवाद स्थापित करने का सतत प्रयास भी किया जाता है। यही इस महाविद्यालय की मूल भावना है। आज महाविद्यालय में आयोजित एक इंटरैक्टिव इंस्टॉलेशन का हिस्सा बनने का अवसर मिला। विषय था घर। यह अनुभव अत्यंत भावनात्मक और आत्मीय रहा। सच ही है, जब बात घर और संवेदना की हो, तो मन स्वत: ही भीग जाता है। इस इंस्टॉलेशन ने वास्तव में अपने घर की अनुभूति करा दी। इस रचनात्मक पहल के पीछे संकाय सदस्य अनिरुद्ध दिवाकर आचार्य का महत्वपूर्ण योगदान है, जिन्होंने अपने विद्यार्थियों के साथ मिलकर इस इंटरैक्टिव आर्ट इंस्टॉलेशन का आयोजन किया। मैं स्वयं भी इस प्रक्रिया का हिस्सा बना। एक कागज पर कुछ नम्बर अंकित थे और नीचे एक घर का चित्र बना था। निर्देश था कि उन सभी नम्बरों से गुजरते हुए अपने घर तक पहुँचना है और साथ ही यह लिखना है कि घर क्या है? मैंने लिखा घर एक संवेदना है और जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। जब लिफाफे से उसकी कार्बन कॉपी निकली और अलग-अलग रेखाओं से घर तक पहुँचने का मार्ग दिखाई दिया, तो वह दृश्य अत्यंत सुंदर और अर्थपूर्ण लगा। हर प्रतिभागी ने अपनी अनुभूति के अनुसार घर को परिभाषित किया। यह अनूठा इंस्टॉलेशन जिसमें इंटरैक्टिव नाटक, खेल और परफॉर्मेंस शामिल हैं घर की अवधारणा और उसके भावनात्मक आयामों की गहन पड़ताल करता है। परियोजना के अंतर्गत विद्यार्थियों ने गलियों, कस्बों और सार्वजनिक स्थलों पर जाकर लगभग 400 से ज्यादा लोगों से संवाद किया। इनमें मजदूर, दुकानदार, शिक्षक, रिक्शा चालक, कलाकार, बच्चे, गृहिणियाँ, आॅटो चालक और विद्यार्थी शामिल थे। सभी ने अपने-अपने अनुभवों के आधार पर घर के अर्थ साझा किए। इस इंस्टॉलेशन में डिस्प्ले भी बहुत शानदार तरीकों से किया गया है। घर बनाने में जिस संसाधन का प्रयोग करते हैं उसी का इस्तेमाल यहां किया गया है डिस्प्ले में। छात्रों से बातचीत में ज्ञात हुआ कि ह्लघरह्व की चर्चा करते समय कुछ लोग भावुक होकर रो भी पड़े। वास्तव में घर की आवश्यकता किसे नहीं है? हर जीव को एक आश्रय चाहिए। जीवन की जिम्मेदारियों के कारण कई लोग अपने घरों से दूर हो जाते हैं, परंतु घर से जुड़ी संवेदना और स्मृतियाँ हमेशा साथ रहती हैं। घर केवल मकान नहीं है — वह बचपन, माता-पिता, भाई-बहन, मित्रों और पड़ोस की स्मृतियों से जुड़ी आत्मीयता है, जिसे भुलाया नहीं जा सकता। इस इंटरैक्टिव इंस्टॉलेशन की विशेषता यह है कि आगंतुक स्वयं भी इसमें भाग लेकर अपनी कला-रचना कर सकते हैं, जिन्हें तुरंत प्रदर्शित किया जा रहा है। अत: आप सभी सादर आमंत्रित हैं आइए, कला एवं शिल्प महाविद्यालय, लखनऊ में इस रचनात्मक आयोजन का हिस्सा बनें, अपने घर से जुड़े भाव व्यक्त करें, और कला अध्यापकों एवं विद्यार्थियों का उत्साहवर्धन करें। यह आयोजन दो दिनों तक चलेगा। कला महाविद्यालय के डीन रतन कुमार, रवि कांत पांडेय, अतुल हंडू, अजय कुमार, भूपेंद्र कुमार अस्थाना, गौरव मिश्रा, धीरज यादव, प्रो राकेश चंद्रा, दिवाकर आचार्य, जाह्नवी आचार्य, रवि अग्रहरि, अम्बरीष मिश्रा सहित सभी छात्र, अध्यापक उपस्थित रहे।





