लखनऊ। पंचांग मुताबिक, माघ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि पर षटतिला एकादशी का पावन व्रत रखा जाता है। इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विधिवत पूजा का विशेष विधान है। मान्यताओं के मुताबिक, षटतिला एकादशी पर तिल का दान और उसका सेवन करना अत्यंत शुभ होता है। कहते हैं कि, षटतिला पर तिल का दान, स्नान, भोजन, उबटन, हवन और जल में तिल का उपयोग करने पर साधक के पापों का नाश होता है। यही नहीं पूर्व जन्मों के दोष भी समाप्त होते हैं। इसके अलावा लक्ष्मी माता भी प्रसन्न होकर अपनी विशेष कृपा बरसाती हैं और साधक की आर्थिक स्थिति में सकारात्मक परिवर्तन होते हैं। पंचांग के मुताबिक, माघ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि की शुरूआत 13 जनवरी 2026 को दोपहर 3 बजकर 17 मिनट से हो रही है। इस तिथि का समापन अगले दिन यानी 14 जनवरी को शाम 5 बजकर 52 मिनट पर है। ऐसे में 14 जनवरी 2026 को षटतिला एकादशी व्रत किया जाएगा। इस दिन मकर संक्रांति का पर्व भी देशभर में मनाया जाएगा। वहीं व्रत का पारण 15 जनवरी को कर सकते हैं। इस दिन आप सुबह 7 बजकर 15 मिनट से लेकर सुबह 9 बजकर 21 मिनट तक व्रत खोल सकते हैं।
षटतिला एकादशी का महत्व
षटतिला एकादशी का नाम ही इसके विशेष महत्व को प्रकट करता है। ह्यषटह्ण अर्थात छह और तिला अर्थात तिल। इस दिन तिल का छह प्रकार से प्रयोग करने का विधान है। शास्त्रों के अनुसार, तिल भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है और इसका उपयोग करने से दरिद्रता का नाश, पापों का क्षय तथा सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। पुराणों में वर्णन मिलता है कि जो व्यक्ति इस दिन श्रद्धापूर्वक व्रत रखता है, तिल का दान करता है और श्रीहरि का स्मरण करता है, उसके पूर्व जन्मों के दोष भी समाप्त हो जाते हैं। षटतिला एकादशी मन, वचन और कर्म झ्र तीनों स्तरों पर शुद्धि का पर्व है।
षटतिला एकादशी पूजा विधि
षटतिला एकादशी के दिन सुबह ही स्नान करें और पूरे घर में गंगाजल का छिड़काव करें। यह साल की पहली एकादशी है, इसलिए साफ-सफाई और कुछ चीजें दान के लिए अवश्य निकाल लें। अब साफ चौकी पर श्री हरि विष्णु की मूर्ति या चित्र स्थापित करें और साथ में देवी लक्ष्मी की मूर्ति भी रखें। फिर प्रभु को वस्त्र अर्पित करें और मूर्ति के पास तिल और गंगाजल छिड़काव कर लें। घी का दीपक जलाएं और पीले फूलों की माला प्रभु को पहनाएं। अब विष्णु जी को तिल अर्पित करें और केले, गुड़ व चने की दान भोग रूप में उनके समक्ष रख दें। विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें और इसके बाद सृष्टि के पालनहार का स्मरण करते हुए उनकी आरती करें। पूजा के बाद तिल का दान करें। यह बेहद शुभ और महत्वपूर्ण होता है।





