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चीन-पाक की साझा हार

एक कहावत है, ‘बंद मुट्ठी लाख की, खुल गयी तो खाक की।’ संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में पाकिस्तान और उसके संरक्षक चीन की कश्मीर मुद्दे साझा पराजय इसी कहावत को चरितार्थ करती है। यह अच्छा ही हुआ कि पाकिस्तान ने चीन के साथ मिलकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कश्मीर का मुद्दा उठाया और वहां इस शैतानी गठजोड़ को शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा। अब पाकिस्तान की हेकड़ी और धमकी निकल चुकी है। वैसे तो पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र महासभा, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग, ओआईसी जैसे संगठनों के समक्ष हर साल कश्मीर मुद्दे को रूटीन के तौर पर उठाता रहता है, लेकिन कभी इस पर चर्चा कराने में सफलता नहीं मिली। कश्मीर में धारा 370 हटाने और भौगोलिक विभाजन करने के बाद पाकिस्तान बौखलाहट में वह सब कर रहा है जिससे कि कश्मीर को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बनाया जा सके। लेकिन उसको हर मंच पर मुंह की खानी पड़ रही है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद या महासभा में कोई प्रस्ताव न आने की स्थिति में एक औपचारिक संवाद के रूप में यूएनएससी की गुप्त बैठक या अनौपचारिक संवाद की एक प्रक्रिया है।

 

अनौपचारिक बैठक का संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के आधिकारिक कामकाज से वैसे तो कोई लेना-देना नहीं है लेकिन अनौपचारिक बैठकों के माध्यम से किसी प्रस्ताव पर सदस्य देशों का रुख जानने-समझने का मौका मिलता है। हालांकि इस बैठक में कोई प्रस्ताव पास नहीं किया जाता, कोई रिकार्ड नहीं रखा जाता, बैठक के फैसलों या संवाद का कोई रिफरेंस भी नहीं दिया जाता और  इस गुप्त बैठक की आधिकारिक जानकारी भी नहीं दी जाती है। लेकिन इससे किसी देश को आगे की रणनीति तय करने में एक दिशा जरूर मिलजाती है। पाकिस्तान ने चीन के माध्यम से कश्मीर में धारा 370 हटाने और कश्मीर के विभाजन के मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सदस्य राष्ट्रों की गुप्त बैठक में चर्चा के लिए रखा। यह बैठक यूएनएससी के स्थायी सदस्य देश चीन की मांग पर बुलायी गयी। बैठक में कश्मीर मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बैठक बुलाकर चर्चा करने की मांग चीन ने रखी जिसका चीन को छोड़कर सभी देशों ने एक सुर में विरोध किया। भारत के साथ 10 अस्थायी सदस्यों के साथ 4 स्थायी सदस्य देश भी खड़े हुए और इस तरह चीन को सिर्फ और सिर्फ अपना समर्थन मिला। चीन-पाकिस्तान की साजिशों को किसी देश ने समर्थन नहीं दिया।

 

बताया जाता है कि बैठक में रूस के प्रतिनिधि ने तो चाइना की इस प्रयास के लिए निंदा भी कर डाली। सुरक्षा परिषद में मात खाने के बाद चीन और पाकिस्तान की झल्लाहट बाद में देखने को मिली, लेकिन भारत के लिए यह कूटनीतिक विजय के साथ सुरक्षा परिषद का भय लगभग खत्म होने जैसा है। पाकिस्तान बार-बार कश्मीर मुद्दे को सुरक्षा परिषद में ले जाने, अंतर्राष्ट्रीयकरण करने, दुनिया भर से मध्यस्थता की गुहार लगाने जैसी हरकतें करता रहता है। अब पाकिस्तान को अपनी और चीन की साझा कूटनीतिक हैसियत मालूम हो गयी। दरअसल वर्तमान विश्व व्यवस्था में जब चीन एक खतरे के रूप में और भारत शांतिदूत के रूप में उभर रहा है, तब भारत के खिलाफ कोई भी देश चीन या पाकिस्तान का समर्थन नहीं करेगा। यही कारण है कि पाकिस्तान को सुरक्षा परिषद, ओआईसी सहित अधिकांश देशों से कश्मीर मुद्दे पर कोई समर्थन नहीं मिला।

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