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चीन पर बाइडेन भी तल्ख

लंबे राजनीतिक विवाद और अदालती जंग के बाद जब तय हो गया कि अमरीका के अगले राष्ट्रपति जो बाइडेन ही होंगे, फिर भी एक लंबे समय तक चीन की कम्यूनिस्ट पार्टी और सरकार ने बाइडेन को जीत की औपचारिक बधाई नहीं दी थी, तभी से अनुमान लगाये जाने लगे थे कि भले ही बाइडेन निवर्तमान राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी हों लेकिन डोनॉल्ड

ट्रंप की जो विदेशनीति रही है विशेषकर एशिया, चीन और भारत के मामले में, शायद उसी रास्ते पर बाइडेन भी चलें। हालांकि डोनॉल्ड ट्रंप ने चुनावी कैंपेन में बाइडेन पर चीन का पिछलग्गू होने का आरोप लगाने के साथ अमरीकियों को चीन का डर भी दिखाया था और शायद इसीलिए कूटनीतिक हलकों में यह आशंका जतायी जा रही थी कि बाइडेन प्रशासन चीन को लेकर टंÑप की अपेक्षा नरम रुख अपना सकता है।

लेकिन डेमोके्रट सरकार की विदेशनीति को लेकर अब तक जो भी आशंकाएं थीं, प्रेसीडेंट इलेक्ट जो बाइडेन ने यह कहकर उसे पूरी तरह से साफ कर दिया है कि चीन का सामना करने के लिए समान विचारधारा वाले लोकतांत्रिक देशों के साथ गठजोड़ बनाने की जरूरत है। प्रेसीडेंट इलेक्ट जो बाइडेन ने सुरक्षा और विदेश नीति एजेंसी की टीम के साथ समीक्षा बैठक में यह बात कही।

इससे स्पष्ट है कि आगामी 20 जनवरी को जब जो बाइडेन अमरीकी राष्ट्रपति का पदभार ग्रहण करेंगे तो उनका प्रशासन सामरिक रणनीति, वैश्विक सुरक्षा, अमरीका के कारोबारी एवं सामरिक हितों और मानवाधिकार व हांगकांग के मुद्दे पर किसी भी तरह से चीन को राहत देने वाले नहीं हैं। चीन ने हाल के वर्षों में आर्थिक सफलता हासिल करने के बाद जिस तरह से दुनिया में व्यापारिक माहौल को खराब कर लाभ उठाया, मानवाधिकारों का दमन, प्रौद्योगिकी की चोरी, हांगकांग, तिब्बत, शिंजियांग में लोगों की व्यक्तिगत आजादी को पूरी तरह खत्म करने और शी जिनपिंग के खिलाफ उठने वाली हर आवाज को दबाने का काम किया है उससे अब अमरीका सहित पूरी दुनिया चीन को लेकर चौकन्नी हो गयी है।

ट्रंप ने चीन को काबू में रखने के लिए समान विचारधारा, मावाधिकार और लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान करने वाले देशों के बीच एक रचनात्मक सहयोग विकसित कर चीन को रोकने की पहल की थी। दरअसल चीन आज न सिर्फ भारत के लिए बड़ा खतरा बन गया है बल्कि सभी पड़ोसी देशों को भी सैन्य आक्रामकता के जरिए धमकाने के साथ ही कर्ज कूटनीति के जरिए छोटे-छोटे देशों के आर्थिक संसाधनों पर कब्जा करना चाहता है।

चीन की इन नीतियों के खिलाफ ही हाल के वर्षों में क्वॉड को लेकर भी गंभीर चर्चा शुरू हुई और इसे माइक पोम्पियों ने भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के साथ मिलकर आगे बढ़ाने का काम किया। अब जबकि प्रेसीडेंट इलेक्ट जो बाइडेन ने स्पष्ट कर दिया है कि चीन को थामने के लिए समान विचारधारा, लोकतांत्रिक मूल्यों एवं मानवाधिकारों का सम्मान करने वाले और समान आर्थिक व सामरिक हित वाले देशों के साथ सहयोग बढ़ाने की जरूरत है तो इससे स्थिति साफ हो गयी है कि भविष्य में चीन के खिलाफ जो भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया और अमरीका जैसे देशों की धुरी उभर रही है वह और मजबूत होगी और इसी में सभी देशों का हित है। चीन को व्यापारिक, सामरिक, मानवाधिकार, तिब्बत, हांगकांग, शिजियांग जैसे किसी भी मुद्दे पर किसी भी तरह की छूट देना ठीक नहीं है और सबको मिलकर चीन की चुनौती का सामना करना होगा।

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