प्रो. नीलू शर्मा को पुष्पगुच्छ भेंट कर उनका स्वागत किया गया
लखनऊ। भातखण्डे संस्कृति विश्वविद्यालय, लखनऊ द्वारा पंडित विष्णु नारायण भातखण्डे जी की पावन स्मृति में स्थापित पीठ के अंतर्गत तालवाद्य विभाग द्वारा दो दिवसीय तबला कार्यशाला का शुभारम्भ विश्वविद्यालय के सुजान सभागार में गरिमामय वातावरण में हुआ। इस कार्यशाला का उद्देश्य भारतीय संगीत की समृद्ध ताल परंपरा, विशेषकर तबले की भूमिका, उसके तकनीकी पक्ष तथा शोधपरक आयामों से विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों को अवगत कराना है।
कार्यशाला के प्रथम दिवस का शुभारम्भ गायन विभागाध्यक्ष प्रो. सृष्टि माथुर द्वारा माँ सरस्वती एवं पंडित विष्णु नारायण भातखण्डे जी की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर किया गया। तत्पश्चात विशेषज्ञ के रूप में उपस्थित प्रो. नीलू शर्मा को पुष्पगुच्छ भेंट कर उनका स्वागत किया गया। इस अवसर पर तालवाद्य विभागाध्यक्ष डॉ. मनोज कुमार मिश्र एवं विश्वविद्यालय के शिक्षक संगतक र्ता के साथ विश्वविद्यालय के शोधार्थी एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे।कार्यशाला के प्रथम दिवस में विशेषज्ञ वक्ता प्रो. नीलू शर्मा ने फरुर्खाबाद घराने की बोल-निकास की तकनीकी विशेषताओं तथा पारंपरिक वादन शैली के अंतर्गत लयकारी, विभिन्न तालों की संरचना, एकल एवं संगत की बारीकियों तथा प्रस्तुति की सौंदर्यात्मक विशेषताओं पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने विद्यार्थियों को तबले की पारंपरिक बंदिशों एवं विभिन्न घरानों की शैलीगत विशेषताओं के व्यावहारिक पहलुओं का प्रशिक्षण दिया। संवाद सत्र में उन्होंने तबला अध्ययन में विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण, प्रामाणिक स्रोतों के उपयोग तथा प्रस्तुति-आधारित शोध की आवश्यकता पर विशेष बल दिया। प्रशिक्षण के दौरान विद्यार्थियों को व्यावहारिक अभ्यास, बोलों की स्पष्टता, हाथों की संतुलित गति तथा संगत की संवेदनशीलता पर विशेष मार्गदर्शन प्रदान किया गया।
इस अवसर पर विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो० मांडवी सिंह ने कहा कि भारतीय संगीत में तबले का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। ऐसी कार्यशालाएँ विद्यार्थियों की व्यावहारिक दक्षता, रचनात्मकता तथा शोधपरक दृष्टि को विकसित करती हैं और उन्हें परंपरा एवं आधुनिकता के संतुलन को समझने का अवसर प्रदान करती हैं।
कुलसचिव डॉ. सृष्टि धवन ने बताया कि विश्वविद्यालय द्वारा स्थापित इस पीठ के अंतर्गत वर्ष भर व्याख्यानमालाएँ, संगोष्ठियाँ, कार्यशालाएँ, संगीत-नृत्य प्रस्तुतियाँ तथा शोधपरक कार्यक्रम आयोजित किए जाते रहेंगे, जिससे संगीत शिक्षा, अनुसंधान तथा समाज के साथ सांस्कृतिक संवाद को नई दिशा प्राप्त होगी। कार्यशाला के प्रथम दिवस के समापन पर प्रतिभागियों ने इसे अत्यंत उपयोगी एवं प्रेरणादायी बताते हुए विश्वविद्यालय के प्रति आभार व्यक्त किया। दो दिवसीय इस कार्यशाला के आगामी सत्रों में उन्नत ताल संरचनाओं, संगत की विशेष तकनीकों तथा प्रस्तुति-आधारित अभ्यास पर विशेष प्रशिक्षण प्रदान किया जाएगा।





