लोकसंस्कारों को आगे बढ़ाने का एक सशक्त माध्यम है
लखनऊ। उत्तराखंड महापरिषद भवन में पारंपरिक होली गायन का शुभारम्भ हो चुका है। होलियार अपने मधुर स्वरों में बैठकी एवं खड़ी होली के गीतों के माध्यम से देवभूमि की समृद्ध लोकसंस्कृति को जीवंत कर रहे हैं। ढोलक, मंजीरा और हारमोनियम की मधुर संगति के साथ गूंजते होली गीत वातावरण को भक्तिमय और उल्लासपूर्ण बना रहे हैं। यह केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि हमारी परंपरा, संस्कृति और लोकसंस्कारों को आगे बढ़ाने का एक सशक्त माध्यम है। आइए, हम सभी इस पावन अवसर पर अधिक से अधिक संख्या में सहभागिता कर अपनी उत्तराखंडी विरासत को संजोने और आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने का संकल्प लें। उत्तराखंड महापरिषद भवन में 1 मार्च 2026 रविवार को होलिकोत्सव का आयोजन 3 बजे से प्रारम्भ किया जायेगा जिसमे लखनऊ में प्रवासी उत्तराखंड समाज होलियारों की टोली बनाकर होली की वेशभूषा में आते हैं, बैठकी एवं खड़ी होली के गीत गाते हैं ! होली रंग, रस और संस्कृति का उत्सव है।
उत्तराखंड में होली फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाई जाती है। पूर्णिमा की रात्रि को 3 मार्च को होलिका दहन है। उसके एक दिन बाद दिनांक 04 मार्च को दिन धुलंडी / रंगों की होली खेली जाएगी । उत्तराखंड में भी वही तिथि मान्य होती है जो पूरे भारत में प्रचलित हिंदू पंचांग के अनुसार उत्तराखंड, विशेषकर कुमाऊँ और गढ़वाल में होली की अपनी विशिष्ट और सांस्कृतिक परंपरा है। कुमाऊँ क्षेत्र में होली लगभग एक महीने पहले से शुरू हो जाती है। बैठकी होली मंदिरों और घरों में बैठकर गाई जाती है। तबला, हारमोनियम के साथ पारंपरिक गायन। खड़ी होली
खुले मैदान या आँगन में गोल घेरा बनाकर नृत्य करते हुए गाई जाती है। लोग पारंपरिक वेशभूषा में ढोल-दमाऊ की थाप पर नाचते हैं। महिला होली महिलाएँ समूह में बैठकर पारंपरिक लोकगीत गाती हैं। इसमें हास्य, व्यंग्य और सामाजिक गीत भी होते हैं। उत्तराखंड की होली की विशेषता यह केवल रंगों का नहीं बल्कि संगीत और संस्कृति का पर्व है।सामूहिकता, भाईचारा और पारंपरिक वेशभूषा इसका मुख्य आकर्षण है। कुमाऊँ की होली को विश्व स्तर पर भी विशिष्ट पहचान मिली है। यह पर्व लगभग बसंत पंचमी से प्रारंभ होकर फाल्गुन पूर्णिमा तक चलता है।





