भारतेंदु नाट्य अकादमी की ओर से नाटक झिमिटी खेल का मंचन
लखनऊ। भारतेंदु नाट्य अकादमी की ओर से नाटक झिमिटी खेल का मंचन एसएनए के संत गाडगे प्रेक्षाग्रह में किया गया। नाटक का लेखन व निर्देशन सत्यव्रता राउत ने किया है। नाटक ओड़िया के प्रसिद्ध कवि सरला दास की ‘सरला महाभारत’ पर आधारित है। यह नाटक भारतीय लोक कथाओं और शास्त्रीय साहित्य का अनूठा संगम है, जो दर्शकों को एक नई संस्कृति से परिचित कराया।
ओड़िया संवेदना और लहजे में एक नाटक लिखा था—झिमिटी खेला। इसके पीछे एक स्पष्ट उद्देश्य था। 1980 के दशक में हम में से कई लोग भारतीय रंगमंच में अपनी पहचान खोज रहे थे—रचना, अभिनय, भाषा और रूप के माध्यम से। वह समय प्रश्नों का था, जब रंगमंच केवल कला नहीं, बल्कि आत्म-पहचान का माध्यम था।
उसी समय संगीत नाटक अकादमी ने कुछ युवा कलाकारों को पहचानने की पहल की—वे कलाकार जिनकी आँखों में आग थी और जिनके भीतर क्षेत्रीय रंगमंच के लिए एक बेचैन आकांक्षा थी। उसी रचनात्मक वातावरण से झिमिटी खेला का जन्म हुआ। समय के साथ यह नाटक इतिहास में कहीं दर्ज होकर रह गया। स्वयं मैं भी भूल गया कि यही प्रस्तुति मुझे चुपचाप रंगमंच निर्देशन के मार्ग पर ले आई थी।
समय बीता और जीवन ने एक पूरा चक्र पूरा किया। आज वैश्वीकरण और डिजिटल युग में भारतीय रंगमंच में क्षेत्रीय परंपरा, लोक कल्पना, भारतीयकरण और राष्ट्रीय पहचान पर बहुत कम चर्चा होती है। हमारा ध्यान अब अधिकतर अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य की ओर है। और तभी, कुछ अप्रत्याशित घटित हुआ। अपनी जड़ों की ओर लौटने का आभास हुआ—एक गहराई से ओड़िया पहचान की ओर। मैं फिर से उन सांस्कृतिक परंपराओं की ओर खिंचने लगा जिन्होंने मुझे गढ़ा था—मयूरभंज छऊ नृत्य, पाला-गायन की परंपरा, रघुराजपुर की पट्टचित्र कला और हमारी गीतिनाट्य परंपरा, जो पीढ़ियों से मेरे रक्त में बहती रही है।
यह वापसी झिमिटी खेला की एक नई प्रस्तुति के रूप में सामने आई—इस बार हिंदी में—जिसे भारतेन्दु नाट्य अकादमी के छात्रों के साथ परिसर में एक रेजिÞडेंसी प्रोजेक्ट के रूप में तैयार किया गया। यह मेरे अपने सांस्कृतिक उत्तराधिकार को दोबारा देखने और समझने की एक प्रक्रिया थी—दूरी, परिपक्वता और विनम्रता के साथ यह कंपन उत्पन्न किया—पीछे मुड़कर अपनी संस्कृति को फिर से देखने का अवसर दिया, केवल स्मृतियों के साथ नहीं, बल्कि एक नई मासूम दृष्टि के साथ।





