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बराबरी और अच्छाई की सीख देती है फिल्म ‘तन्वी द ग्रेट’

अनुपम खेर इस फिल्म से दो दशक बाद निर्देशन में उतरे हैं
लखनऊ। ‘कोई किसी को सपने देखने से कैसे रोक सकता है?’ यह डायलॉग है, जाने-माने अभिनेता अनुपम खेर की ताजातरीन फिल्म ‘तन्वी द ग्रेट’ का। असल जिंदगी में भी वह ‘कुछ भी हो सकता है’ और ‘आपके बारे में सबसे बेहतरीन चीज आप खुद हैं’ जैसे प्रेरक फलसफे पर यकीन करते हैं। अनुपम खेर की इस फिल्म का सार भी यही है कि ‘हर इंसान अलग’ है और यही उसकी खूबी है। दुनिया की नजर में बेहद कमजोर दिखने वाला इंसान भी ठान ले तो बड़े से बड़ा सपना पूरा कर सकता है। ये फिल्म बराबरी और अच्छाई की सीख देती यह फिल्म एक बार देखी जा सकती है।
अनुपम खेर इस फिल्म से दो दशक बाद निर्देशन में उतरे हैं। वह इसके सह-लेखक भी हैं। फिल्म उनके लिए इस मायने में भी खास है कि कहानी की प्रेरणा उनकी खुद की आॅटिस्टिक भांजी तन्वी है। सैन्य ट्रेनिंग के लिए मशहूर उत्तराखंड के लैंसडाउन में सेट यह कहानी है, एक स्पेशल चाइल्ड तन्वी (शुभांगी दत्त) की, जो दिल्ली में अपनी मां डॉक्टर विद्या रैना (पल्लवी जोशी) के साथ रहती है। तन्वी को आॅटिज्म है, जिस कारण वह दूसरों से अलग है। अपने पिता कैप्टन समर रैना (करण टैकर) को वह बचपन में ही खो चुकी है। ऐसे में, जब उसकी मां विद्या को एक समिट के लिए यूएस जाना पड़ता है, तो तन्वी को अपने दादा कर्नल प्रताप रैना (अनुपम खेर) के पास लैंसडाउन आना पड़ता है।एक अनुशासित जिंदगी जीने वाले कर्नल रैना के लिए आॅटिस्टिक तन्वी के अलहदा व्यक्तित्व से तालमेल बिठाना आसान नहीं होता। कई बार उनके बीच तकरार और बहसबाजी भी होती है। खासकर तब, जब तन्वी अपने शहीद पिता का सियाचिन की सबसे ऊंची चोटी पर तिरंगा फहराने के अधूरे सपने को पूरा करने और सेना में जाने की जिद ठान लेती है। फिल्म की कहानी निश्चित तौर पर प्रेरक है, जो किसी को भी कमतर न समझने की सीख देती है। यह पॉजिटिविटी, अच्छाई और दूसरों की खूबियां देखने की पैरवी करती है। फर्स्ट हाफ में स्क्रीनप्ले भी अच्छा बन पड़ा है। एकाकी जीवन जी रहे रिटायर फौजी दादा के जीवन में तन्वी की मासूमियत और जिद कैसे नए रंग भरती है, यह देखना सुहाता है। कई हल्के-फुल्के पल भी हैं, जो चेहरे पर मुस्कान लाते हैं, मगर सेकंड हाफ में कहानी की रफ्तार सुस्त और पकड़ कमजोर पड़ जाती है।एक समय के बाद तन्वी का हीरोइज्म सहज और विश्वसनीय नहीं, बल्कि अतिश्योक्ति लगता है। विद्या का आॅटिज्म समिट वाला ट्रैक फ्लो को तोड़ता है, वहीं फिल्म की लंबाई भी खलती है। हालांकि, अदाकारी की बात करें तो शुभांगी इस फिल्म की खोज कही जाएंगी। अपनी पहली ही फिल्म में एक आॅटिस्टिक लड़की की चुनौतीपूर्ण भूमिका में उन्होंने आत्मविश्वास भरी एक्टिंग की है। तन्वी की सहजता और मासूमियत को उन्होंने बखूबी पर्दे पर उतारा है। अनुपम खेर ने हमेशा की तरह मंझी हुई एक्टिंग की है। कर्नल रैना के किरदार में वह जमे हैं।ब्रिगेडियर जोशी के रूप में जैकी श्रॉफ, मेजर श्रीनिवासन के रोल में अरविंद स्वामी, रजा साहब बने बोमन ईरानी भी अपनी-अपनी भूमिकाओं के साथ न्याय करते हैं और फिल्म को जरूरी सपोर्ट देते हैं। जबकि, करण टैकर और पल्लवी जोशी कुछ खास प्रभाव नहीं छोड़ते।

ऐक्टर: अनुपम खेर, शुभांगी दत्त, जैकी श्रॉफ, अरविंद स्वामी, बोमन ईरानी, पल्लवी जोशी
डायरेक्टर : अनुपम खेर
रेटिंग-3/5

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