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मां कुष्मांडा की आराधना में डूबा शहर, भक्तों की लगी लंबी कतार

लखनऊ। नवरात्र के चौथे दिन माता के कूष्मांडा स्वरूप की पूजा हुई। मां कूष्मांडा अपने भक्तों को रोग, शोक और विनाश से मुक्त करके आयु, यश, बल और बुद्धि प्रदान करती हैं। माता की आठ भुजाएं हैं। माता के हाथों में कमंडल, धनुष, बाण, कमल, अमृतपूर्ण कलश, चक्र, गदा व जप माला है। माता का वाहन सिंह है। कूष्मांडा देवी को मीठे का भोग लगाया जाता है। भक्तों ने बड़ी संख्या में मंदिर पहुंचकर पूरे विधि विधान के साथ पूजन किया। माता के जयकारे से मंदिर परिसर गूंज उठा। चौक स्थित काली जी मंदिर में माता को गुलाबी वस्त्र पहनाए गए। गुलाब और गेंदे के फूलों से मां का शृंगार हुआ। माता को सिंघाड़े का हलवा, खीर और फलाहार का भोग लगाया गया। वहीं ठाकुरगंज स्थित मां पूर्वी देवी मंदिर में माता को हरे रंग के वस्त्र पहनाए गए। भवन को गुलाब व सफेद फूलों से सजाया गया। माता को खीर, पेड़ा और फल का भोग लगाया गया। माता को सीताफल अर्पण किया गया। आरती के बाद भक्तों के बीच सीताफल प्रसाद के रूप वितरित किया गया।

बस तेरे नाम का सहारा है वरना कौन है हमारा:
भक्तों ने दुर्गा सप्तशती के मंत्रों पर हवन किया और हरि ओम तत्सत का पाठ किया। मंदिर की महिला मंडली ने मैया मेरी बुलाये कैसे न हम आयें, बस तेरे नाम का सहारा है वरना कौन है हमारा, एक से बढ़कर एक गीत गाकर सभी को भाव विभोर कर दिया। वहीं चौपटिया स्थित संदोहन देवी मंदिर में गरुण पर सवार माता के अद्धभुत दर्शन मिले। माता को गुलाबी वस्त्र पहनाए गए। संतोषी माता मंदिर में मां का फूलों से शृंगार हुआ। मेहंदीगंज स्थित शीतला देवी मंदिर माता को गुलाबी वस्त्र पहनाए गए। फूलों से माता का दरबार सजाया गया। चौपटिया स्थित काली बाड़ी मंदिर में माता को मछली का भोग लगाया गया।

दर्शन के लिए उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़
लखनऊ। चैत्र नवरात्रि के चतुर्थ दिवस चौक स्थित मठ श्री बड़ी काली जी मंदिर में लगभग सवा लाख श्रद्धालुओं ने अब तक माई का श्रृंगार प्रसाद भोग एवं दर्शन लाभ प्राप्त किया।महंत श्री विवेकानंद गिरी जी महाराज ने चतुर्थ दिवस के स्वरूप माता माँ कुष्मांडा को सृष्टि की आदि शक्ति माना जाता है।मान्यता है कि इन्होंने अपनी हल्की मुस्कान से पूरे ब्रह्मांड की रचना की थी, इसलिए इन्हें आदि सृष्टिकर्त्री भी कहा जाता है। माँ का रंग तेजस्वी और चमकदार होता है इनके आठ हाथ होते हैं, इसलिए इन्हें अष्टभुजा देवी भी कहा जाता है ये सिंह (शेर) पर सवार होती हैं इनके हाथों में कमंडल, धनुष, बाण, कमल, अमृत कलश, चक्र, गदा और जपमाला होती है। माना जाता है कि ये देवी सूर्य लोक में निवास करती हैं ये अपने भक्तों को स्वास्थ्य, शक्ति और ऊर्जा प्रदान करती हैं इनकी पूजा से रोग, कष्ट और दरिद्रता दूर होती है।
मीडिया प्रभारी अभय उपाध्याय ने बताया की यहां विशेष रूप से मेवा मिष्ठान एवं लॉन्ग का प्रसाद माता को चढ़ाया जाता है एवं आरती में प्रयोग हुआ लॉन्ग को प्रसाद के रूप में आरती के पश्चात भक्तों को बांटा जाता है । मंदिर प्रांगण समिति द्वारा आज तक कुल 83 मुंडन संस्कार हुआ एवं सभी को मंदिर कार्यालय द्वारा मुंडन संस्कार पश्चात एक प्रमाण पत्र दिया जाता है जो बताता है कि अमुख बच्चे का मुंडन संस्कार मंदिर प्रांगण में संपन्न हुआ । मंदिर में विशेष रूप से लखनऊ के अतिरिक्त बाराबंकी सीतापुर कानपुर उन्नाव रायबरेली एवं जिलों से भक्तों का आगमन परिवार सहित बड़ी संख्या में होता रहता है जो मंदिर में दर्शन आदि करने के अतिरिक्त बाहर लगे मेले में खरीदारी झूले आदि का आनंद लेते हैं। मंदिर में प्रत्येक दिन रात्रि 10 रात्रि आरती की जाती है जिसमें ढोल नगाड़े ताशे का प्रयोग किया जाता है एवं भजन कीर्तन कार्यक्रम आरती पश्चात प्रत्येक दिन नवरात्रि तक चलता रहता है । मंदिर में विशेष रूप पूर्व उप मुख्यमंत्री/ राज्यसभा सांसद डॉ दिनेश शर्मा एवं पूर्व ओएसडी मुख्यमंत्री अभिषेक कौशिक ने माता के दर्शन लाभ लिए । मंदिर व्यवस्था में मुख्य रूप से अभय उपाध्याय मुकुंद मिश्रा सिंह देवराज सिंह आदर्श महाराज शिवम् पंडित जी राहुल सारस्वत तुषार वर्मा पंकज उपाध्याय मेघांश वैभव सिंह एवं अन्य सेवादार उपस्थित रहे।

मां कूष्मांडा की पूजा कर मांगा आरोग्य:
मां कूष्मांडा की पूजा अर्चना कर श्रद्धालुओं ने आरोग्य की कामना की। मंदिरों में लगातार श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ती जा रही है। माता के जयकारों से पूरा वातावरण भक्तिमय हो रहा है। मंगलवार को श्रद्धालुओं ने माता कूष्मांडा की श्रद्धा विश्वास के साथ पूजा अर्चना की। शास्त्रों के अनुसार मां कूष्मांडा की पूजा करने से आयुए यशए बल और आरोग्य की प्राप्ति होती है। ब्रह्मंड की रचना करने के कारण इन्हें कूष्मांडा कहा जाता है। ये सृष्टि की आदिस्वरूपा आदि शक्ति हैं।

51 शक्ति पीठ में मां का रक्तांबर शृंगार हुआ:
नंदन बक्शी का तालाब स्थित 51 शक्तिपीठ धाम में वासंतिक नवरात्र के चौथे दिन रविवार को माँ कुष्मांडा के पिंडी पूजन का सौभाग्य आचार्य मयंक पांडे एवं वंदना पांडे को प्राप्त हुआ। 51 शक्तिपीठ में आज नवरात्र के चतुर्थ दिवस मां का रक्तांबर श्रृंगार हुआ। पिंडी पूजन आचार्य धनंजय पांडे द्वारा संपन्न हुआ। मंदिर की की अध्यक्ष तृप्ति तिवारी ने बताया कि नवरात्र के प्रतिदिन मां का अलग-अलग स्वरूपों में रंगों में पूजा अर्चना की जाएगी शाम को भजन कीर्तन के आयोजन किए गए। भजन की शुरूआत पुष्पा, आकांक्षा, गीता, वंदना, कुमकुम ने मेरी मैया किवड़िया खोलो…, से की। उसके बाद महारानी वरदानी धन्य धन्य विंध्याचल रानी, सुनाया तो मन्दिर मे माता के जयकारे गूंजे।

कालीबाड़ी में भक्तों ने शाम को ग्रहण किया व्रत प्रसाद:
घसियारी मंडी स्थित कालीबाड़ी मंदिर रंगबिरंगी लाइटों से और मां के दरबार को फूलों सजाया गया है। शाम को महा आरती के बाद व्रत का प्रसाद भक्तों में वितरित किया गया। मन्दिर के अध्यक्ष गौतम भट्टाचार्य ने बताया कि पहले दिन प्रसाद में भक्तों को लौकी का हलवा, साबूदाने की खीर, आलू जीरा, छेना खीर आदि का प्रसाद वितरित किया गया।

मुंडन संस्कार शुरू हुए:
चौक स्थित बड़ी कालीजी मंदिर में मां का भव्य श्रृंगार किया गया। साथ ही मंदिर परिसर में मुंडन संस्कार भी शुरू हो गए। इसके अलावा चौक स्थित छोटी कालीजी मंदिर, घसियारी मंडी स्थित कालीबाड़ी, शास्त्री नगर स्थित दुर्गा माता मंदिर समेत अन्य देवी मंदिरों में मां का फूलों, मेवों आदि से भव्य श्रंगार किया गया। सुबह भव्य श्रृंगार के बाद महाआरती के साथ ही मंदिरों के कपाट भक्तों के लिए खोल दिए गए। इस दौरान भक्तों ने मां से सुख-शांति और परिवार के मंगल की मनोकामना की।

आज होगी पहाड़ों में रहने वाली स्कंदमाता की पूजा
लखनऊ। पहाड़ों पर रहकर सांसारिक जीवों में नवचेतना का निर्माण करने वालीं स्कंदमाता का नवरात्रि में पांचवें दिन पूजा-अर्चना की जाती है। मां दुर्गा का पंचम रूप स्कंदमाता के रूप में जाना जाता है। भगवान स्कंद कुमार ख्कार्तिकेय, की माता होने के कारण दुर्गा जी के इस पांचवें स्वरूप को स्कंद माता नाम प्राप्त हुआ है। भगवान स्कंद जी बालरूप में माता की गोद में बैठे होते हैं इस दिन साधक का मन विशुद्ध चक्र में अवस्थित होता है। स्कंद मातृस्वरूपिणी देवी की चार भुजाएं हैं, ये दाहिनी ऊपरी भुजा में भगवान स्कंद को गोद में पकड़े हैं और दाहिनी निचली भुजा जो ऊपर को उठी है, उसमें कमल पकडा हुआ है। मां का वर्ण पूर्णतरू शुभ्र है और कमल के पुष्प पर विराजित रहती हैं। इसी से इन्हें पद्मासना की देवी और विद्यावाहिनी दुर्गा देवी भी कहा जाता है। इनका वाहन भी सिंह है। स्कंदमाता सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री देवी है। इनकी उपासना करने से साधक अलौकिक तेज की प्राप्ति करता है। यह अलौकिक प्रभामंडल प्रतिक्षण उसके योगक्षेम का निर्वहन करता है। एकाग्रभाव से मन को पवित्र करके मां की स्तुति करने से दुरूखों से मुक्ति पाकर मोक्ष का मार्ग सुलभ होता है। शास्त्रों में इसका काफी महत्व बताया गया है। इनकी उपासना से भक्त की सारी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं।

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