दिव्य सांस्कृतिक शैक्षिक संस्थान की नाट्य प्रस्तुति
लखनऊ। दिव्य सांस्कृतिक शैक्षिक संस्थान की नाट्य प्रस्तुति अरे…शरीफ लोग का मंचन उद्यान भवन में किया गया। नाटक लेखन जयंत दलवी व निर्देशन संजय त्रिपाठी ने किया। जिन्दगी जिन्दादिली का नाम है मुर्दा दिल क्या खाक जिया करते है। लेकिन जिन्दादिली कब दिल्लगी बन जाये और दिल्लगी कब फेंकदिली कहा नहीं जा सकता, खास तौर पर अगर ये काम शरीफ लोग करें। वैसे भी हमारे समाज में भारीफ लोगों की एक परिभाशा नियत है कि वो भाादी गुदा बाल-बच्चों वाला 10 से 5 नौकरी करने वाला व्यक्ति होता है, सीधी नजरे करके चलने वाला, उससे ऐसी उम्मीद की जाती है कि वो दाएं से बाए नही देखगा। लेकिन थोड़ी बहुत दिल्लगी की छूट तो सबको है बार्ते वो दिलफेंकी न बन जाये, भई अंग्रेजी में भी तो कहावत है मैन विल बी मैन अगर हिन्दी में तजुर्मा करें तो बंदर कितना भी बूढ़ा हो जाये गुलाठी मारना नही छोड़ता। ऐसे ही हमारे नाटक की कहानी भी है, इस शरीफ अपार्टमेंट की जिसके ग्राउंड फ्लोर पर चंदा नाम की एक हसीना रहने आती है और खलबली मच जाती है पहले और दूसरे फ्लोर पर रहने वाले भारीफ लोगों में, जिसमें सचिवालय के हेड बाबू अनोखेलाल जी, पोस्ट मास्टर पंडित जी, आयुर्वेद के डॉक्टर घटक और प्राइमरी स्कूल के मास्टर बिहारीलाल है, जोकि सभी है तो भारीफ बाल-बच्चों वाले लेकिन दिल्लगी की छूट तो है ही, बस दिनभर ऊपर बालकनी से किसी न किसी बहाने चंदा का दीदार होता है और इनकी हरकतों से इनकी बीबियां बेहाल होती है, हर रोज चारों घर में इसी कारण बवाल होता रहता है। और इस दिल्लगी और बवाल में घी का काम करता है अनोखेलाल का लड़का गोपी।





