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लखनऊ का रंगमंच सामूहिक प्रयासों से ही समृद्ध हुआ : सूर्यमोहन

विश्व रंगमंच दिवस आज

लखनऊ। 27 मार्च को विश्व रंगमंच दिवस मनाया जाता है। मगर समय के साथ रंगमंच को पेश करने का तरीका भी बदला है। नई नकनीक, नया तरीका, आज के कलाकारों में अभिनय के प्रति नया नजरिया इन सब चीजों ने रंगमंच को एक नया आयाम दिया है। धिरे-धिरे रंगमंच में भी कई बदलाव हुए हैं। इन्हीं सब चीजों को लेकर राजधानी के जानेमाने रंगकर्मियों ने विश्व रंगमंच दिवस पर अपनी-अपनी बात कही।
शहर के वरिष्ठ रंगकर्मी सूर्य मोहन कुलश्रेष्ठ कहते हैं आर्ट और एंटरटेनमेंट में अंतर होता है। मनोरंजन बस टाइमपास के लिए होता है, जबकि आर्ट से हम जीने की कला सीखते हैं। आज ज्यादातर लोग थियेटर को मनोरंजन के तौर पर लेते हैं। वो जुनून नहीं दिखता जो पहले हुआ करता था। लखनऊ का रंगमंच तो सामूहिक प्रयासों से ही समृद्ध हुआ है, हर कोई अपनी भूमिका को बखूबी समझता था, मेहनत करता था। आज उन सामूहिक प्रयासों की कमी खलती है। जब हम लोग भगवद्अज्जुकीयम नाटक कर रहे थे, तो किसी को भी भरतनाट्यम नहीं आता था। नार्वे में शो होना था। छत पर रिहर्सल की। दो महीने तक भरतनाट्यम का अभ्यास किया। बिना म्यूजिक के पूरा प्ले तैयार हो गया, बाद में म्यूजिक रिकॉर्ड किया गया। थियेटर एक बहुत बड़ी विधा है। त्याग और मेहनत चाहिए होता है। 1989 की बात है। मुझे पदार्फाश नाटक याद आता है। उस समय सांप्रदायिक एकता के लिए अयोध्या मार्च किया था। लखनऊ से अयोध्या पैदल पहुंचने में छह दिन लगे। इस सफर में गांव और चौराहों पर नुक्कड़ नाटक करते हुए चलते। वरिष्ठ कलाकार मृदुला भारद्वाज उन दिनों स्कूल भी संभालतीं फिर जैसे-तैसे नाटक की जगह पर पहुंच जातीं। हम सब लोगों ने इसी तरह मिलकर काम किया। विचार और कला के स्तर पर ये बहुत बड़ा काम लगता है। तब और अब तक रंगमंच में जो भी बड़े नाम निकले, उनके लिए रंगमंच रोजी-रोटी का जरिया कभी नहीं रहा। रोजी-रोटी कहीं और से चलती थी और रंगमंच पैशन था। अब लोग थियेटर में कॅरियर और कमाने के लिए आ रहे, इसे नाम कमाने की सीढ़ी समझ रहे।

नाटक के लिए घर का सामान बेचा : प्रभात बोस:
फिल्म इंस्टीटयूट से पास आउट और राज्यपाल द्वारा कला रत्न से सम्मानित प्रभात बोस कहते हैं कि रंगमंच का जुनून ऐसा चढ़ा कि इसी की दुनिया में बस गये। 1970 में मैंने इसमें कदम रखा और अब तक मैंने सैकड़ों नाटक पूरे भारत वर्ष में किये हैं। शुरू में बहुत मुश्किलें हुई। नाटक करने के लिए पैसा नहीं होते थे तो घर का सामान बेच दिया, लेकिन नाटक को रुकने नहीं दिया। पहले भी नाटकों को दायरा पलिक से ही जुड़ा होता था। आज भी वही है, लेकिन आ उद्देश्य पूर्ण नाटकों को सही तरीके से प्रस्तुत नहीं किया जा रहा है। वरगल नाटकों का मंचन नहीं होना चाहिए

रंगमंच सशक्त हुआ है : मुकेश वर्मा:
युवा रंगमंच कलाकारों में मुकेश वर्मा ने बताया कि थियेटर मेरा शौक था, मगर पता नहीं का यह शौक जुनून बन गया। पता ही नहीं चला। अब तक 40 नाटकों में काम कर चुका हूं। नाटक माई सैंडल को पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने बैन कर दिया था। मुकेश कहते हैं कि रंगमंच एक पाठशाला है। यहां पर व्यवसाय नहीं होता। पहले की अपेक्षा रंगमंच सशक्त हुआ है। किसी का एकाधिकार नहीं है। नए प्रयोग हो रहे हैं, जो रंगमंच के लिए शुभ संकेत है।

रंगमंच दिवस की शुरूआत:
विश्व रंगमंच दिवस की स्थापना 1961 में इंटरनेशनल थियेटर इंस्टीट्यूट द्वारा की गई थी। इस दिन को मनाने का उद्देश्य नाटकों के प्रति जागरूकता व नाटकों की मनोरंजन व मनुष्य के जीवन में बदलाव की भूमिका है। इस दिन का एक महत्त्वपूर्ण आयोजन अंतरराष्ट्रीय रंगमंच संदेश है। 1962 में पहला अंतरराष्ट्रीय रंगमंच संदेश फ्रांस की जीन काक्टे ने दिया था। 2002 में यह संदेश भारत के प्रसिद्ध रंगकर्मी स्व. गिरीश कर्नाड द्वारा दिया गया। इस बार का संदेश पाकिस्तान के अजोका थियेटर के प्रमुख शाहिद नदीम द्वारा दिया गया ।

रंगमंच में हो रहे हैं नये-नये प्रयोग: अनिल रस्तोगी
वरिष्ठ रंगकर्मी व अभिनेता अनिल रस्तोगी कहते हैं लखनऊ का रंगमंच पिछले एक वर्ष बहुत सक्रिय रहा। अब रंगमंच में नये-नये प्रयोग होने लगे हैं। दर्पण संस्था ने कुछ पुरानी प्रस्तुतियों के साथ उर्मिल थपलियाल के निर्देशन में स्वयं लिखित हे ब्रेख्त, हेमेंद्र भाटिया द्वारा लिखित व निर्देशित तुम और अश्विनी मक्खन के निर्देशन में कामता नाथ की कहानी देवी आगमन मंचित किया। राज बिसारिआ के निर्देशन में राकेश वेदा द्वारा अलेक्सी आबुर्जोव के नाटक द ओल्ड वर्ड का रूपांतरण विभास का मंचन किया। इस द्वि पात्रीय नाटक में मेरी पांच वर्ष बाद और शोभना जगदीश की लगभग 40 वर्ष बाद रंगमंच में वापसी हुई। राज बिसारिया स्टूडियो थिएटर में प्रफुल्ल त्रिपाठी लिखित व निर्देशित नाटक तिरोभूत के कई मंचन कर नई परंपरा शुरू की। सूर्यमोहन कुलश्रेष्ठ के निर्देशन में इरविन शा के नाटक बरी द डेड का मंचन लखनऊ के अलावा भारत रंग महोत्सव में भी हुआ। इसी प्रकार आतमजीत सिंह द्वारा निर्देशित नाटक मुंशीगंज गोलीकांड लखनऊ व भारत रंग महोत्सव दिल्ली में मंचित हुआ। नये नाटकों जिसमें मोहम्मद असलम द्वारा लिखित गुलाम रिश्ते, निर्देशन राजा अवस्थी, खिलानों की बरात, निर्देशन ललित सिंह पोखरिआ और केके अग्रवाल द्वारा प्रेमचंद की कहानियों पर आधारित नाटक जीवन यात्रा जिसका निर्देशन उन्हीं ने किया।

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