लखनऊ। बसौड़ा का पर्व हर साल चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन माता शीतला की पूजा की जाती है। उन्हें बासी खाने का भोग लगाया जाता है। इसलिए इसे शीतला अष्टमी भी कहा जाता है। देश के विभिन्न हिस्सों में मनाया जाता है। आमतौर पर होली से आठ दिन बाद यह त्योहार पड़ता है। लेकिन, कई लोग इसे बोले के बाह पहले सोमवार या शुक्रवार को भी मनाते हैं। शीतला माता की पूजा देश के अलग अलग भागों में अलग-अलग दिन होती है। कई क्षेत्रों में शीतला सप्तमी बसौड़ा का पर्व चैत्र कृष्ण सप्तमी को मनाया जाता है जो अबकी बार 10 मार्च को है। लेकिन जहां शीतला अष्टमी का पर्व चैत्र कृष्ण पक्ष में मनाया जाता है वहां 11 मार्च को शीतला अष्टमी का पर्व मनाया जाएगा। बता दें कि मुख्य रुप से बसौड़ा उत्तर प्रदेश,बिहार, राजस्थान, हरियाणा, मध्य प्रदेश और गुजरात जैसे राज्य में मनाया जाता है। बता दें कि बसौड़ा सर्दी की समाप्ति और गर्मी के आरंभ का प्रतीक है। गर्मी का आरंभ होते ही त्वचा रोग आदि शुरू हो जाते हैं इसलिए उनसे रक्षा करने के लिए माता शीतला की पूजा की जाती है। विशेष रुप से छोटे बच्चों के लिए यह पूजा की जाती है।
बसोड़ा की पूजा विधि
बसोड़ा पूजा से एक दिन पहले यानी सप्तमी तिथि को शाम के समय अपने रसोई घर की अच्छे से साफ सफाई करके भोजन बना लें। माता शीतला को बासी खाने का ही भोग लगाया जाता है। इस दिन माता के भोग में मुख्य रुप से दही, रबड़ी, चावल, हलवा, पूड़ी आदि बनाकर माता को भोग लगाया जाता है। इसके बाद बड़े बुजुर्गों के पैर छूकर आशीर्वाद लिया जाता है। सबसे पहले शीतला माता को रोली का तिलक लगाएं और फिर उन्हें काजल, वस्त्र आदि ,सभी सामान अर्पित कर दें। इसके बाद माता शीतला की कथा का पाठ करें और फिर उन्हें बासी चीजों का भोग लगाएं। अंत में सभी को प्रसाद बांटे और खुद भी इसका सेवन करें।
शीतला सप्तमी पर मां को लगाएं दिव्य भोग, सभी कष्टों से मिलेगी मुक्ति
लखनऊ। हिंदू धर्म में शीतला सप्तमी का पर्व विशेष महत्व रखता है। चैत्र महीने के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व पूरी तरह से माता शीतला को समर्पित है। इस साल शीतला सप्तमी का पर्व 10 मार्च को मनाया जाएगा। इस दिन माता शीतला की पूजा करने से न केवल बीमारियों से मुक्ति मिलती है, बल्कि घर में सुख-शांति का वास भी होता है। शीतला सप्तमी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इस दिन घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता। भक्त एक दिन पहले बना हुआ भोजन माता को चढ़ाते हैं और खुद भी वही खाते हैं, तो आइए उन दिव्य भोग के बारे में जानते हैं जिन्हें अर्पित करने से माता खुश होती हैं।
मीठे चावल
इस शुभ दिन पर माता शीतला को गुड़ या शक्कर से बने मीठे चावल का भोग लगाना बहुत शुभ माना जाता है। इसे सप्तमी से एक रात पहले तैयार कर लिया जाता है। मान्यता है कि मीठे चावल माता को शीतलता प्रदान करते हैं और भक्तों के जीवन में मिठास लाते हैं।
दही और राबड़ी
इस दिन शीतला माता को दही और राबड़ी का भोग विशेष रूप से लगाया जाता है। कहा जाता है कि यह माता रानी को बहुत पसंद है। ऐसा कहा जाता है कि इसे भोग के रूप में चढ़ाने से रोग-दोष से मुक्ति मिलती है।
गुलगुले
आटे और गुड़ के बने गुलगुले इस दिन के मुख्य प्रसाद का हिस्सा होते हैं। इन्हें तेल या घी में तलकर एक दिन पहले ही रख लिया जाता है। पूजा के समय इन्हें माता के सामने रखकर संतान की लंबी आयु और अच्छी सेहत की कामना की जाती है।
मूंग की दाल
इस दिन भीगी हुई मूंग की दाल और बाजरा भी माता शीतला को अर्पित की जाती है। इसे चढ़ाने से देवी की पूर्ण कृपा मिलती है।
शीतला सप्तमी शुभ मुहूर्त
वैदिक पंचांग के अनुसार, चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि की शुरूआत 09 मार्च को देर रात 11 बजकर 27 मिनट पर शुरू होगी और 11 मार्च को देर रात 01 बजकर 54 मिनट पर समाप्त होगी। इस प्रकार यानी उदया तिथि से 10 मार्च को शीतला सप्तमी मनाई जाएगी। शीतला सप्तमी पर पूजा के लिए शुभ समय 10 मार्च को सुबह 06 बजकर 24 मिनट से लेकर शाम 06 बजकर 26 मिनट तक है। इस दौरान साधक देवी मां शीतला की पूजा कर सकते हैं। वहीं, बुधवार 11 मार्च को बसोड़ा मनाया जाएगा।
शीतला सप्तमी शुभ योग
ज्योतिषियों की मानें तो चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि पर कई मंगलकारी योग बन रहे हैं। इस दिन हर्षण योग का संयोग सुबह 08 बजकर 21 मिनट तक है। इसके साथ ही रवि योग का भी संयोग है। इन योग में मां शीतला की पूजा करने से शुभ कामों में सफलता एवं सिद्धि मिलेगी। साथ ही आरोग्यता का वरदान मिलेगा।





