सामूहिक सांस्कृतिक धरोहर बन जाते हैं
लखनऊ। कभी-कभी कोई कला केंद्र केवल ईंट, पत्थर और सीमेंट से निर्मित भवन नहीं होता, बल्कि वह मनुष्य की जिजीविषा, उसके स्वप्नों, संघर्षों और सांस्कृतिक प्रतिबद्धताओं का जीवंत दस्तावेज बन जाता है। लखनऊ से जुड़े उन्नाव जनपद के मोहान में स्थापित शीला क्रियेशन कला प्रशिक्षण केंद्र और अनामिका आर्ट गैलरी ऐसी ही एक सांस्कृतिक उपलब्धि है, जो यह सिद्ध करती है कि मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति उसकी शारीरिक सामर्थ्य में नहीं, बल्कि उसके अटूट संकल्प और सृजनशील चेतना में निहित होती है। 25 मई 2026 को उत्तर प्रदेश सरकार की मातृभूमि योजना के अंतर्गत इस केंद्र का लोकार्पण केवल एक संस्थान का उद्घाटन नहीं, बल्कि संघर्ष को सृजन में रूपांतरित कर देने वाली एक प्रेरक मानवीय यात्रा का सार्वजनिक उत्सव है। यह उस विश्वास का उद्घोष है कि जब स्वप्न सामाजिक सरोकारों से जुड़ते हैं, तब वे व्यक्तिगत उपलब्धि न रहकर सामूहिक सांस्कृतिक धरोहर बन जाते हैं। इस केंद्र की आत्मा हैं चित्रकार शीला शर्मा, जिनका जीवन साहस और सृजन का एक अद्वितीय उदाहरण है। मात्र चार वर्ष की आयु में एक रेल दुर्घटना ने उनके दोनों हाथ छीन लिए, किंतु उनके भीतर की कलाकार को नहीं। जीवन ने जहाँ उनके सामने सीमाओं की दीवार खड़ी की, वहीं उन्होंने अपने पैरों को अभिव्यक्ति का माध्यम बनाकर उन सीमाओं को रंगों और रेखाओं से लांघ दिया। उनकी कृतियाँ केवल चित्र नहीं, बल्कि आत्मबल, धैर्य और जीवन के प्रति अटूट विश्वास की दृश्य कविताएँ हैं। वे हमें यह अनुभव कराती हैं कि कला हाथों से नहीं, संवेदना और चेतना से जन्म लेती है। लखनऊ की समृद्ध कला परंपरा—जिसने भारतीय आधुनिक कला को अनेक महत्वपूर्ण कलाकार, मूर्तिकार, छापाचित्रकार और कला शिक्षाविद दिए—उसकी सांस्कृतिक विरासत शीला शर्मा के सृजन में भी परिलक्षित होती है। किंतु उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उन्होंने महानगरों तक सीमित कला-संसाधनों और अवसरों को ग्रामीण समाज तक पहुँचाने का संकल्प लिया। 1991 में लखनऊ विश्वविद्यालय के कला एवं शिल्प महाविद्यालय से प्राप्त उनकी कला शिक्षा ने उनके सृजन को वैचारिक गहराई प्रदान की। शीला शर्मा समकालीन भारतीय कला जगत की एक प्रतिष्ठित चित्रकार हैं, जिन्होंने अपनी अदम्य इच्छाशक्ति, सृजनात्मक दृष्टि और निरंतर कला-साधना के बल पर राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशिष्ट पहचान स्थापित की है। लखनऊ विश्वविद्यालय के कला एवं शिल्प महाविद्यालय से बी.एफ.ए. उपाधि प्राप्त करने के पश्चात उन्होंने मुंबई, नई दिल्ली, भोपाल, बेंगलुरु, लखनऊ सहित देश के अनेक प्रमुख कला केंद्रों में एकल प्रदर्शनियाँ आयोजित कीं तथा दुबई, सिंगापुर और शिकागो जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी अपनी कला का प्रदर्शन किया। उन्हें भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय की जूनियर फैलोशिप, उत्तर प्रदेश संस्कृति विभाग की फैलोशिप तथा राष्ट्रीय पुरस्कार सहित अनेक सम्मान प्राप्त हुए हैं। माउथ एंड फूट पेंटिंग आर्टिस्ट असोसियेशन की सदस्य के रूप में शीला शर्मा की कला संघर्ष, संवेदना और मानवीय जिजीविषा की सशक्त अभिव्यक्ति है, जो उन्हें समकालीन भारतीय कला परिदृश्य में एक प्रेरणादायी व्यक्तित्व के रूप में स्थापित करती है। आज जब कला के अधिकांश मंच बड़े शहरों में केंद्रित हैं और ग्रामीण प्रतिभाएँ उचित मार्गदर्शन के अभाव में उपेक्षित रह जाती हैं, तब मोहान जैसे कस्बे में कला प्रशिक्षण केंद्र और आर्ट गैलरी की स्थापना कला के विकेंद्रीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक हस्तक्षेप है। यह केवल एक स्थानीय पहल नहीं, बल्कि इस विश्वास का विस्तार है कि प्रतिभा का जन्म स्थान नहीं, अवसर उसके विकास का आधार होता है। एक अर्थ में शीला क्रियेशन लखनऊ की ऐतिहासिक कला विरासत और समकालीन कला चेतना के बीच एक जीवंत सेतु है। यहाँ परंपरा और आधुनिकता, लोक और समकालीनता, कला शिक्षा और सामाजिक सरोकार—सभी एक-दूसरे से संवाद करते दिखाई देते हैं। यह केंद्र उन बच्चों और युवाओं के लिए आशा का द्वार बनेगा, जो सीमित संसाधनों के बावजूद अपने भीतर छिपे कलाकार को पहचानना चाहते हैं। इस स्वप्न को साकार करने में प्रख्यात मूर्तिशिल्पी सुधीर शर्मा की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। वे केवल शीला शर्मा के जीवनसाथी नहीं, बल्कि उनकी संपूर्ण रचनात्मक यात्रा के सहयात्री हैं। कला के प्रति उनकी प्रतिबद्धता, युवा कलाकारों को निरंतर प्रोत्साहित करने की उनकी प्रवृत्ति और सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति उनका समर्पण इस परियोजना की आधारशिला के समान है। दोनों कलाकारों ने मिलकर यह सिद्ध किया है कि कला केवल व्यक्तिगत उपलब्धि का माध्यम नहीं, बल्कि समाज के प्रति उत्तरदायित्व निभाने का सशक्त साधन भी है। व्यक्तिगत रूप से जब मुझे लखनऊ कला महाविद्यालय में अध्ययन के दौरान सुधीर शर्मा और बाद में शीला शर्मा के सान्निध्य में आने का अवसर मिला, तब उनके व्यक्तित्व का जो पक्ष सामने आया, वह केवल कला तक सीमित नहीं था। उनके भीतर संघर्ष की कठोरता नहीं, बल्कि संवेदना की कोमलता दिखाई देती है। उन्होंने यह सिखाया कि कलाकार की वास्तविक पहचान उसकी कृतियों से उतनी नहीं बनती, जितनी उसके जीवन-मूल्यों और मानवीय दृष्टि से बनती है। मातृभूमि योजना के अंतर्गत निर्मित इस केंद्र में सरकारी सहयोग और जनभागीदारी का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। विशेष उल्लेखनीय तथ्य यह है कि स्वयं शीला शर्मा ने इसके निर्माण में उल्लेखनीय आर्थिक योगदान दिया है। यह उस कलाकार की सामाजिक प्रतिबद्धता का प्रमाण है, जो अपनी उपलब्धियों को निजी सीमा में नहीं रखती, बल्कि उन्हें आने वाली पीढ़ियों के लिए सांस्कृतिक आधारभूमि में रूपांतरित करना चाहती है। भविष्य की योजना है कि केंद्र का मुख्य द्वार महाप्राण निराला के नाम समर्पित होगा तथा परिसर में रामविलास शर्मा, अशोक वाजपेयी, रणवीर सिंह बिष्ट, बी.एन. आर्य और अन्य सांस्कृतिक विभूतियों के कृतित्व से प्रेरित भित्ति चित्र और गेस्ट हाउस भी स्थापित किए जाएंगे। वहीं अनामिका आर्ट गैलरी क्षेत्रीय, समकालीन और दिव्यांग कलाकारों की कलाकृतियों को मंच प्रदान कर कला के लोकतांत्रिक स्वरूप को और अधिक व्यापक बनाएगी। यह गैलरी केवल प्रदर्शन का स्थल नहीं, बल्कि विचारों, अनुभवों और रचनात्मक संवादों का जीवंत सांस्कृतिक मंच होगी। आज जब समाज में संवेदनशीलता का संकट गहराता जा रहा है और कला का सार्वजनिक जीवन से संवाद सीमित होता जा रहा है, तब ऐसे केंद्रों का महत्व और बढ़ जाता है। कला केवल सौंदर्यबोध नहीं, बल्कि मनुष्य को अधिक मानवीय बनाने की प्रक्रिया है। वह हमें देखने, समझने और महसूस करने की नई दृष्टि प्रदान करती है। इसी अर्थ में शीला क्रियेशन कला प्रशिक्षण केंद्र एक सांस्कृतिक संस्था से कहीं अधिक एक सामाजिक आवश्यकता के रूप में उभरता है। वास्तव में, शीला क्रियेशन एक भवन नहीं, एक विचार है; एक संस्था नहीं, बल्कि संघर्ष, संवेदना और सृजन का सांस्कृतिक घोष है। यह हमें स्मरण कराता है कि जीवन जब हाथों से सब कुछ छीन ले, तब भी यदि भीतर सृजन की लौ जीवित रहे, तो मनुष्य अपने पैरों से भी इतिहास लिख सकता है। मोहान की धरती पर रोपा गया यह कला-बीज आने वाले वर्षों में निश्चय ही एक ऐसे वटवृक्ष का रूप लेगा, जिसकी छाया में कला, संस्कृति, संवेदना और मानवीय मूल्यों की नई पीढ़ियाँ विकसित होंगी। यही इस केंद्र की सबसे बड़ी उपलब्धि होगी और शायद यही शीला शर्मा एवं सुधीर शर्मा के कला-संकल्प का सबसे सुंदर प्रतिफल भी।
भुपेन्द्र अस्थाना





