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कांग्रेस की वरिष्ठ नेता मोहसिना किदवई का 94 वर्ष की आयु में निधन, खरगे और राहुल ने दुख जताया

नई दिल्ली। भारतीय राजनीति की दिग्गज शख्सियत, पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस की वरिष्ठ नेता मोहसिना किदवई का बुधवार तड़के 94 वर्ष की आयु में निधन हो गया। पारिवारिक सूत्रों के अनुसार, उन्होंने नोएडा के एक अस्पताल में सुबह करीब चार बजे अंतिम सांस ली, जहां वे पिछले कुछ दिनों से बढ़ती उम्र और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के चलते भर्ती थीं। किदवई अपने पीछे तीन बेटियों का भरा-पूरा परिवार छोड़ गई हैं। उनके पार्थिव शरीर को दिल्ली के निजामुद्दीन स्थित कब्रिस्तान में सुपुर्द-ए-खाक किया जाएगा। उनके निधन की खबर से कांग्रेस खेमे सहित देश के राजनीतिक हलकों में शोक छा गया है।

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी ने उनके निधन पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए इसे पार्टी और राष्ट्र के लिए एक अपूरणीय क्षति बताया है। खरगे ने उनके छह दशकों के सार्वजनिक जीवन को याद करते हुए कहा कि किदवई पार्टी के सबसे चुनौतीपूर्ण दौर में भी एक मजबूत मार्गदर्शक की तरह खड़ी रहीं। राहुल गांधी ने उन्हें ‘जनसेवा का उदाहरण’ और ‘सादगी की प्रतिमूर्ति’ बताते हुए कहा कि उनकी गरिमामयी राजनीतिक यात्रा ने देश की महिलाओं की कई पीढ़ियों को प्रेरित किया है। उत्तर प्रदेश की राजनीति से लेकर केंद्र तक, उन्होंने अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई थी जिसे कांग्रेस नेतृत्व ने आज भावभीनी श्रद्धांजलि के साथ याद किया।

मोहसिना किदवई का राजनीतिक करियर बेहद प्रभावशाली रहा। उन्होंने राजीव गांधी सरकार में स्वास्थ्य, परिवहन और शहरी विकास जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाली। वे न केवल लोकसभा और राज्यसभा की लंबे समय तक सदस्य रहीं, बल्कि कांग्रेस कार्य समिति (CWC) में भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका राजनीतिक सफर 1960 के दशक में उत्तर प्रदेश विधानसभा और विधान परिषद से शुरू हुआ था, जहां उन्होंने राज्य सरकार में मंत्री के रूप में भी कार्य किया। संगठन के प्रति उनकी निष्ठा और प्रशासनिक पकड़ ने उन्हें इंदिरा गांधी और राजीव गांधी दोनों के कार्यकाल में भरोसेमंद रणनीतिकार के रूप में स्थापित किया था।

राष्ट्रीय राजनीति में उनके उदय की कहानी बेहद दिलचस्प है, जो 1978 के आजमगढ़ उपचुनाव से जुड़ी है। आपातकाल के बाद जब कांग्रेस अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही थी, तब आजमगढ़ संसदीय सीट पर किदवई की ऐतिहासिक जीत ने पार्टी में संजीवनी फूंकने का काम किया था। इस जीत ने न केवल इंदिरा गांधी के नेतृत्व को फिर से मजबूती प्रदान की, बल्कि कांग्रेस की राष्ट्रीय राजनीति में वापसी का मार्ग भी प्रशस्त किया। वह एक ऐसी नेता थीं जिन्होंने सत्ता और विपक्ष दोनों ही भूमिकाओं में संसदीय मर्यादाओं का सदैव पालन किया, जिसके कारण आज उनके निधन पर राजनीतिक सीमाओं से परे जाकर लोग उन्हें याद कर रहे हैं।

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