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पद्मश्री डॉ. बसंती बिष्ट को मिला 6वां लोकनिर्मला सम्मान

केजीएमयू की कुलपति पद्मश्री डॉ सोनिया नित्यानंद ने दिया सम्मान
लखनऊ। लोक गायिका पद्मश्री मालिनी अवस्थी की माता निर्मला अवस्थी की स्मृति में रोपित लोकनिर्मला सम्मान रुपी पौध का षष्टम पुष्प मंगलवार को उत्तराखंड के जागर गायन की परम्परा को प्रसिद्ध करने वाली लोकगायिका पद्मश्री विदुषी डॉ बसंती बिष्ट को समर्पित किया गया। डॉ बसंती उत्तराखंड की पहली ऐसी महिला है जिन्होंने मंच पर जागर गायन किया है। उनके पहले सिर्फ पुरुष की मंच पर जागर गायन किया करते थे। सोनचिरैया संस्था द्वारा गोमतीनगर स्थित संगीत नाटक अकादमी में आयोजित कार्यक्रम के दौरान मुख्य अतिथि के तौर पर शामिल केजीएमयू की कुलपति पद्मश्री डॉ सोनिया नित्यानंद ने उन्हें यह सम्मान दिया। सम्मान स्वरुप उन्हें एक लाख रू की धनराशि,अंगवस्त्र और प्रशस्ति पत्र दिया गया। इस दौरान सोनचिरैया की अध्यक्षा पद्मश्री विद्या विन्दु सिंह भी उपस्थित रहीं। इस अवसर पर मुख्य अतिथि सोनिया नित्यानंद ने कहा कि डॉ बसंती का जीवन हर एक के लिए प्रेरणादायक है। वे आत्म सशक्तिकरण का सशक्त उदाहरण हैं। आपने जो चाहा ना सिर्फ उसे पाया बल्कि उसमें ऊंचाई भी प्राप्त की। उन्होंने कहा कि भारत में विकास और विरासत दोनों को साथ लेकर चलने की जरूरत है। आज भारत तकनीक के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है। हमे विकास के साथ साथ विरासत को भी साथ लेकर चलना होगा। संगीत और कलाओं का तो हर जगह महत्व है। मेडिकल साइंस भी यह मानता है कि संगीत जल्दी उपचार में मदद करता है। उन्होने यह भी कहा कि मालिनी अवस्थी ने यह सिद्ध किया है कि बेटियां अपने माता पिता की विरासत को समृद्ध करती हैं। मैंने अक्सर देखा है कि जब कोई बीमार होता है तो अक्सर उनकी तीमारदारी बेटियां ही करती हैं। इस अवसर पर लोकगायिका मालिनी अवस्थी ने कहा कि मेरी मां गा नहीं सकती थीं लेकिन वो मुझे ना सिर्फ संगीत के गुरुओं तक ले गईं बल्कि मेरी उंगली पकड़ कर मुझे देश के कोने कोने में पहुंचाती रहीं। मैं उनके प्रति उऋण तो कभी नहीं हो सकती पर मुझे यह विचार आया कि उनके नाम से उन महिला लोक कलाकारों को सम्मानित किया जाना चाहिये। जिन्होंने अनेक कठिनाइयों का सामना करते हुए ना सिर्फ रूढ़ियों को तोड़ा है बल्कि एक अलग मुकाम भी हासिल किया। इसके पहले ऐसी पहल कहीं नहीं हुई थी।
सांस्कृतिक प्रस्तुतियों की कड़ी में पहली प्रस्तुति बुंदेलखंड के कलाकारों ने होली के गीतों पर दी। ‘आज बिरज में होरी रे रसिया’,’होली खेले रघुबीरा अवध में’ और ‘केसरिया रंग डारि कन्हैया ने’ जैसे गीतों पर कलाकारों ने लोगों के साथ जमकर फूलों की होली खेली। इस प्रस्तुति के बाद राजस्थान के मेवा सपेरा एंड ग्रुप ने कालवेलिया नृत्य की प्रस्तुति ‘कालो कूद पड्यो मेलन में’ गीत पर दी। शाम की खास प्रस्तुति पद्मश्री बसंती बिष्ट की रही। प्रस्तुति की शुरूआत उन्होंने भगवान शिव के जागर से की। यह जागर दो सहेलियों संजोया और लक्ष्मी की कथा थी जिनको देव सभा में आने की अनुमति नहीं मिलती तो वे शिव के पास जाती हैं। शिव ध्यान में बैठे होते हैं तो वे भी ध्यान में बैठ जाती हैं। शिव के उठने पर वे सब भूल कर उनकी भक्ति का वरदान मांगती है जागर है -‘दिन बूढ़ो घाम संजोया ढली गे’। इस सुन्दर प्रस्तुति के बाद उन्होंने गोधूलि वेला में श्री कृष्ण का गायों को चराने जाने का दृश्य ‘लागो गोकुलो बैराठो’ गीत के माध्यम से प्रस्तुत किया। इस गीत में उनकी पोती सौम्य बिष्ट ने श्री कृष्ण के रूप में सुन्दर उत्तराखंडी नृत्य भी प्रस्तुत किया। बसंती ने बीज बोते समय कृषक समाज द्वारा गाया जाने वाला हरेला गीत ‘सुफल हवे जाय भूमिया देवो’ और कुमाऊं का छपेली लोकगीत ‘मेरी हरु हरुली’ की भी प्रस्तुति दी। शाम की अंतिम रंगमय प्रस्तुति लोक गायिका मालिनी अवस्थी ने दी। उन्होंने दादरा ‘रंगी सारी गुलाबी चुनरिया’ से शुरू करते हुए ‘रंगवा औरों अबीर खेलत भिजली बदनिया’,’रंग डारूंगी नन्द के लालन पर ‘और ‘होरी खेले रघुवीरा’ जैसे गीतों पर प्रस्तुति देकर सभी को होली की मस्ती में सराबोर किया। उन्होंने काशी की श्मशान की होली के रंग भी ‘होली खेले मसाने में’ के जरिये दिखाये। इस अवसर पर मुख्यमंत्री के सलाहकार अवनीश अवस्थी,संगीत नाटक अकादमी के अध्यक्ष प्रो जयंत खोत, निदेशक शोभित नाहर के साथ बड़ी संख्या में लोग उपस्थित रहे।

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