लखनऊ। उत्तर प्रदेश की सात सीटों पर हुए उपचुनाव के नतीजों से भारतीय जनता पार्टी के खेमे में जहां बम-बम हो रही है, वहीं विपक्ष मायूस है। कांग्रेस के लिए कुछ राहत वाली बात यह हो सकती है कि इस बार वह दो सीटों में मुख्य लड़ाई में आ गयी। मंगलवार को घोषित नतीजों से साफ हो गया है कि विपक्ष के नोटबंदी की विफलता, कोविड काल में सरकार की असफलता और सरकारी दावों के जमीनी स्तर तक न पहुंचने के आरोपों को जनता ने नकार दिया।
भाजपा सरकार में ब्राह्मणों के उत्पीड़न की बात भी कोई मुद्दा नहीं बन सकी। ये नतीजे सरकार की नीतियों और कार्यक्रमों पर जनता की मुहर ही माने जायेंगे। भाजपा के शीर्ष नेताओं की मेहनत भी रंग लायी। खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तो हर सीट पर प्रचार करने गये ही, उनके मंत्रियों और पार्टी पदाधिकारियों ने भी दिन-रात एक करके बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं से तालमेल करके कमल खिला दिया।
दूसरी ओर विपक्ष का हाल यह रहा कि सपा और बसपा मुखिया किसी सीट पर प्रचार करने नहीं गये। कांग्रेस नेता प्रियंका अथवा राहुल गांधी भी खुद प्रचार करने नहीं गये लेकिन उन्होंने अपने पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं का इतना मनोबल जरूर बढ़ाया कि पार्टी दो स्थानों पर मुख्य लड़ाई में आ गयी।
सपा के लिए संतोष वाली बात यह है कि उसने कुछ अतिरिक्त हासिल नहीं किया, तो कुछ खोया भी नहीं। जहां तक बहुजन समाज पार्टी की बापा और कांग्रेस का खेल बिगाड़ने की भूमिका ही निभायी। बताते चलें कि वर्ष 2017 में हुए आम चुनाव में इन सीत सीटों में से छह भाजपा के पास और जौनपुर की मल्हनी सीट सपा के पास थी। वहां से सपा के पारसनाथ यादव जीते थे और निर्दलीय धनंजय सिंह दूसरे नंबर पर रहे थे।
इस बार भी सपा से पारसनाथ यादव के बेटे लकी यादव को उतारा गया और उन्होंने जीत दर्ज कर यह सीट लागातर तीन बार सपा के खाते में पहुंचाने का श्रेय हासिल किया है। इस बार भी धनंजय दूसरे नंबर पर रहे। पर पिछली बार वह जहां 21210 वोटों से मात खाये थे, वहीं इस बार यह अंतर 4604 पर ही सिमट गया। कांग्रेस के लिए संतोष वाली बात सिर्फ इतनी हो सकती है कि बांगरमऊ और घाटमपुर सीट पर वह मुख्य मुकाबले में रही।
बांगरमऊ में उसकी प्रत्याशी ने भाजपा को कड़ी टक्कर देते हुए दूसरा स्थान हासिल कर लिया। पर, भाजपा प्रत्याशी और कांग्रेस में जीत का अंतर 31 हजार से ज्यादा वोटों का रहा। अन्य सभी सीटों पर कांग्रेस मुख्य मुकाबले से काफी दूर रही। बांगरमऊ में पिछली बार प्रत्याशी कुलदीप सेंगर सपा के बदलू खान से 28327 वोटों से जीते थे। इस बार यहां कांग्रेस और सपा में दूसरे नंबर की लड़ाई हुई और सपा लगभग चार हजार वोटों से उससे पिछड़ गयी। इसी प्रकार घाटमपुर में भाजपा फिर बड़े अंतर से जीती, लेकिन इस बार कांग्रेस प्रत्याशी डा. कृपा शंकर दूसरे नंबर पर रहे।
पिछले चुनाव में दूसरे नंबर पर बसपा थी। जहां तक देवरिया सीट की बात है तो पिछले चुनाव में यहां से सपा दूसरे नंबर पर थी और इस बार भी सपा ही मुख्य लड़ाई में रही। नौगवा सादात सीट पर इस बार भाजपा फिर जीती और सपा ही फिर दूसरे नंबर पर रही। बुलंदशहर में भाजपा जीती और पिछली बार की तरह बसपा को दूसरे नंबर पर संतोष करना पड़ा। टूंडला में इस बार भाजपा ने जहां दोबारा विजय पताका फहरायी, वहीं दूसरे नंबर पर बसपा के बजाय सपा ने दूसरा नंबर हासिल किया।
सभी सीटों के विश्लेषण से यह भी साफ हुआ है कि यदि विपक्ष, खासतौर पर सपा और बसपा का गठजोड़ होता तो भाजपा की राह में कांटे बिछ जाते। इन उपचुनावों का परिणाम सरकार गिराने या बचाने जैसा महत्वपूर्ण नहीं था, लेकिन 2022 में होने वाल मुख्य मुकाबले से पहले सेमीफाइल माने जाने वाले इस उप चुनाव ने विपक्ष को आत्मविशेषण का अवसर जरूर दिया है। सपा, बसपा और कांग्रेस को भी विरोध के अपने तौर-तरीकों पर मंथन करना होगा।





