पारंपरिक कला-चेतना को व्यापक भारतीय संदर्भ से जोड़ा जा सके
लखनऊ। उत्तराखंड में 18 से 24 फरवरी 2026 तक आयोजित चम्पावत सरस कार्बेट महोत्सव में वरिष्ठ कलाकार, कला दीर्घा, अंतर्राष्ट्रीय दृश्य कला पत्रिका के संपादक तथा डॉ. शकुंतला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विश्वविद्यालय के कलाचार्य डॉ. अवधेश मिश्र रिसोर्स पर्सन के रूप में सहभागिता करेंगे। उनके मार्गदर्शन में ऐपण शिल्पियों को देश की विविध लोककलाओं एवं समकालीन कला का प्रशिक्षण प्रदान किया जाएगा, जिससे पारंपरिक कला-चेतना को व्यापक भारतीय संदर्भ से जोड़ा जा सके। महोत्सव में डॉ अवधेश मिश्र के साथ सहायक कलाकार के रूप में ललित कला परास्नातक के छात्र पुलक मिश्र और हिमांशु गुप्त सम्मिलित होंगे। चम्पावत महोत्सव उत्तराखंड का एक महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक एवं पर्यटन आयोजन है, जहाँ कुमाऊँ अंचल की लोकपरंपराएँ, कला, शिल्प, संगीत, नृत्य और स्थानीय जीवनशैली एक जीवंत उत्सवधर्मी वातावरण में अभिव्यक्त होती हैं। इस महोत्सव का उद्देश्य क्षेत्रीय सांस्कृतिक धरोहर का संरक्षण, स्थानीय कलाकारों को सशक्त मंच प्रदान करना तथा पर्यटन को प्रोत्साहन देना है। यहाँ झोड़ा, छपेली और चांचरी जैसे कुमाऊँनी-गढ़वाली लोकनृत्यों की मनोहारी प्रस्तुतियाँ ढोल, दमाऊ और रणसिंघा की गूँज के साथ वातावरण को आलोकित करती हैं। साथ ही स्थानीय हस्तशिल्प, ऊनी वस्त्र, रिंगाल एवं बाँस की कारीगरी की प्रदर्शनी-विक्रय, पारंपरिक व्यंजनों, जैसे – भट्ट की चुड़कानी, रस और झंगोरे की खीर का स्वाद, खेलकूद एवं सांस्कृतिक प्रतियोगिताएँ तथा क्षेत्रीय विकास योजनाओं की झलक इस आयोजन को बहुआयामी स्वरूप प्रदान करती हैं। देश-विदेश से आने वाले पर्यटक हिमालयी दृश्यावलियों, हरित घाटियों और निर्मल परिवेश का अनुभव करते हुए स्थानीय अर्थव्यवस्था होटल, परिवहन, हस्तशिल्प और बाजार को सुदृढ़ बनाते हैं। शीत और वसंत ऋतु के मध्य जिला प्रशासन एवं स्थानीय संस्थाओं के सहयोग से आयोजित यह महोत्सव कुमाऊँ की जीवंत सांस्कृतिक चेतना का उत्सव है, जहाँ इतिहास, परंपरा और आधुनिकता का संतुलित समन्वय दृष्टिगोचर होता है।
आमंत्रित कलाकार डॉ. अवधेश मिश्र भारतीय समकालीन कला जगत में लगभग तीन दशकों से सृजन और विचार दोनों के प्रति समान प्रतिबद्धता के साथ सक्रिय हैं। प्रख्यात चित्रकार, कला समीक्षक, शिक्षक और संपादक के रूप में उनकी विशिष्ट पहचान स्थापित है। उनकी कला का मूल स्रोत ग्रामीण परिवेश है, जहाँ बाल्यावस्था से किशोरावस्था तक संचित संवेदनाएँ उनकी रचनात्मक चेतना का स्थायी आधार बनीं। उनकी कृतियाँ केवल दृश्यात्मक संरचनाएँ नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक विमर्श का गहन दृश्य-पाठ प्रस्तुत करती हैं। डॉ. मिश्र का व्यक्तित्व उनकी कला की ही भाँति संतुलित, अनुशासित और आत्मसंयमी है। मृदुभाषी और संवेदनशील होने के साथ वे सामाजिक सरोकारों के प्रति सजग तथा अपने लक्ष्य के प्रति अत्यंत गंभीर हैं। समय-प्रबंधन और नैतिक प्रतिबद्धता का यह समन्वय उन्हें एक साथ प्रभावी कलाकार, अध्यापक, समीक्षक और संपादक के रूप में प्रतिष्ठित करता है। उनकी कला-यात्रा का प्रारंभ ग्रामीण परिवेश में मिट्टी, कोयले और गेरू से बने उन आरंभिक चित्रों से हुआ, जहाँ दीवारें और भूमि ही उनका प्रथम कैनवास थीं। औपचारिक कला-शिक्षा के क्रम में उन्होंने कॉलेज आॅफ आर्ट एंड क्राफ्ट, लखनऊ से आर्ट मास्टर्स ट्रेनिंग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से बी.एफ.ए. एवं एम.एफ.ए., रूहेलखंड विश्वविद्यालय, बरेली से पीएच.डी. तथा इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ से डी.लिट. उपाधि अर्जित की। तैल माध्यम में स्पैचुला, रोलर और विविध टेक्स्चर प्रयोगों द्वारा उन्होंने आकारगत बंधनों से मुक्त, भावप्रधान चित्र-भाषा विकसित की। लखनऊ की ऐतिहासिक इमारतों पर आधारित उनकी मोनोक्रोम श्रृंखला परंपरा और समकालीन संवेदना के सृजनात्मक समन्वय का प्रभावी उदाहरण है।
कला-समीक्षक और संपादक के रूप में भी उनका योगदान उल्लेखनीय है। वर्ष 2000 से प्रकाशित कला दीर्घा अंतरराष्ट्रीय दृश्य कला पत्रिका का संपादन तथा कला विमर्श, संवेदना और कला और पहला दस्तावेज जैसी कृतियाँ भारतीय समकालीन कला-चिंतन में मील का पत्थर मानी जाती हैं। उनकी चर्चित विजूका श्रृंखला में खेतों में खड़ा पुतला भारतीय ग्रामीण संस्कृति, भय, सत्ता, व्यवस्था और नैतिक विघटन का बहुस्तरीय प्रतीक बनकर उभरता है। अयोध्या, भोपाल, लखनऊ, जयपुर, हैदराबाद, दिल्ली, मुंबई, पुणे, वाराणसी, प्रयागराज सहित देश-विदेश के अनेक नगरों – लंदन, वेनिस, बर्मिंघम, इटली, दुबई और मस्कट में प्रदर्शित इस श्रृंखला ने उन्हें व्यापक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पहचान प्रदान की है। अब तक वे 19 एकल प्रदर्शनियों, सैकड़ों सामूहिक प्रदर्शनियों तथा अनेक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय कला-शिविरों में सहभागिता कर चुके हैं। डॉ. अवधेश मिश्र की चित्रभाषा में धूसर, हरा, नीला, पीला और गहरा स्याह जैसे रंग गाँव की मिट्टी से उठे प्रतीत होते हैं। कागज की नाव, फिरकी, झंडियाँ, तख्ती, वर्णमाला, हल और चूल्हा जैसे प्रतीक उनके लिए उधार के बिंब नहीं बल्कि जिए हुए अनुभवों के सजीव अंश हैं। तीन दशकों से अधिक की निरंतर सृजन-साधना के उपरांत भी उनकी रचनात्मक ऊर्जा अक्षुण्ण है। चित्रण, अध्यापन और लेखन-संपादन के माध्यम से वे भारतीय समकालीन कला को दीर्घदृष्टि और वैचारिक समृद्धि प्रदान करते हुए निरंतर सक्रिय हैं।





